सनातन धर्म और गौरक्षा के लिए ऐतिहासिक पहल
वाराणसी
काशी के धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र जगद्गुरु स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने हाल ही में ‘शंकराचार्य चतुरंगिणी सेना’ का गठन किया है। यह सेना सनातन धर्म की मान्यताओं और परंपराओं की रक्षा करने के साथ-साथ गौरक्षा के संकल्प को साकार करने के लिए संगठित रूप में काम करेगी। शंकराचार्य ने इसके संचालन के लिए ‘शंकराचार्य चतुरंगिणी सभा’ का भी औपचारिक गठन किया है, जो संगठन के प्रशिक्षण, नीति निर्धारण, समन्वय और संगठनात्मक गतिविधियों को संचालित करेगी।
शंकराचार्य चतुरंगिणी सेना के सदस्य न केवल शारीरिक रूप से प्रशिक्षित होंगे, बल्कि उनके भीतर धार्मिक आस्था, अनुशासन और समाज सेवा की भावना भी विकसित की जाएगी। प्रत्येक सदस्य के हाथ में फरसा होगा, जो उनके धर्म, संस्कृति और गौरक्षा के प्रति अटूट संकल्प का प्रतीक माना जाएगा। शंकराचार्य ने काशी के शंकराचार्य घाट स्थित श्रीविद्यामठ में आयोजित समारोह में बताया कि यह सेना समाज और धर्म की रक्षा के लिए एक संगठित एवं सक्रिय भूमिका निभाएगी। उन्होंने कहा कि यह पहल न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि समाज में नैतिकता और धार्मिक चेतना बनाए रखने का भी कार्य करेगी।
आगामी माघ मास की अमावस्या के दिन शंकराचार्य चतुरंगिणी सेना के एक अक्षौहिणी सैनिक के साथ संगम स्नान करेंगे। यह संगम स्नान न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान होगा बल्कि सेना के औपचारिक आरंभ का प्रतीक भी माना जाएगा। इसके बाद सेना धीरे-धीरे अपने धार्मिक, सामाजिक और गौरक्षा संबंधी कार्यों को सक्रिय रूप से संचालित करेगी।
विशेषज्ञों और धर्मज्ञों का मानना है कि यह पहल काशी और पूरे उत्तर प्रदेश के धार्मिक और सामाजिक परिदृश्य में एक नई दिशा प्रस्तुत करती है। इस तरह की संगठित धार्मिक-सामाजिक पहल से न केवल सनातन धर्म और धार्मिक परंपराओं की रक्षा होगी, बल्कि समाज में जागरूकता, अनुशासन और सुरक्षा की भावना भी बढ़ेगी। स्थानीय लोगों और भक्तों ने इस कदम की सराहना की है और इसे धर्म, संस्कृति और गौरक्षा की रक्षा में एक मजबूत संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
भविष्य में इस सेना के विस्तार की योजना भी बनाई जा रही है, ताकि यह न केवल काशी और आसपास के क्षेत्रों में बल्कि पूरे राज्य में सनातन धर्म की रक्षा, गौरक्षा और धार्मिक चेतना के प्रसार में प्रभावशाली भूमिका निभा सके। इस पहल को समाज में नैतिकता, धर्म और सुरक्षा को जोड़ने वाले नए युग की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है


