मुख्यमंत्री के बयान से सियासत में भूचाल, चुनाव आयोग भी कटघरे में
लखनऊ/दिल्ली: SIR को लेकर अब मामला सिर्फ तकनीकी प्रक्रिया का नहीं रह गया है, बल्कि यह भारतीय राजनीति का बड़ा सियासी टकराव बन चुका है। एक तरफ केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह (Amit Shah) लोकसभा में एसआईआर का खुलकर समर्थन कर रहे हैं और चुनाव आयोग की प्रक्रिया को पूरी तरह सही ठहरा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (Chief Minister Yogi Adityanath) ने अपने बयान से राजनीतिक बम फोड़ दिया है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का यह कहना कि “एसआईआर में 4 करोड़ नाम मिसिंग हो गए, ये हमारे लोग हैं, जिनमें 85 से 90 प्रतिशत भाजपा के वोटर हैं” ने न सिर्फ विपक्ष को हमला करने का मौका दे दिया है, बल्कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। योगी के बयान के अनुसार जनवरी 2025 में उत्तर प्रदेश में 15 करोड़ 44 लाख मतदाता थे।
एसआईआर के बाद सूची में सिर्फ 12 करोड़ नाम सामने आए, यानी करीब 4 करोड़ वोटर ‘गायब’ यह आंकड़ा सामान्य प्रशासनिक त्रुटि नहीं, बल्कि चुनावी संतुलन को प्रभावित करने वाला बड़ा खेल माना जा रहा है। योगी के अनुसार, इन गायब मतदाताओं में बड़ी संख्या बीजेपी के पारंपरिक समर्थकों की है।दिलचस्प यह है कि यह टकराव बीजेपी बनाम विपक्ष नहीं, बल्कि बीजेपी के भीतर दो संवैधानिक शक्तियों के बीच असहज स्थिति को उजागर करता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि योगी का बयान केवल प्रशासनिक चिंता नहीं, बल्कि यह आने वाले चुनावों को लेकर ग्राउंड रिपोर्ट का अलार्म है। सीधे शब्दों में योगी ने भले ही अमित शाह का नाम न लिया हो, लेकिन एसआईआर चुनाव आयोग और केंद्र सरकार की रणनीति तीनों को एक साथ सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया।
यह संदेश साफ है
“अगर वोटर ही गायब हो जाएंगे, तो चुनाव कैसे जीते जाएंगे?”
योगी के बयान के बाद विपक्ष को ऐसा मुद्दा मिल गया है, जिसकी उसे तलाश थी।अब विपक्ष कह सकता है जब खुद मुख्यमंत्री चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहे हैं तो एसआईआर की निष्पक्षता कैसे मानी जाए? यह बयान विपक्ष के नैरेटिव को वैधता देता है, जो अब तक सिर्फ आरोपों तक सीमित था। कुछ जानकार इसे सोची-समझी रणनीति भी मान रहे हैं केंद्र पर दबाव बनाने की कोशिश,एसआईआर प्रक्रिया में सुधार की मांग और उत्तर प्रदेश जैसे निर्णायक राज्य में वोटर बेस सुरक्षित रखने का प्रयास है।
योगी का यह रुख बताता है कि 2027 की तैयारी अब खुले मंच पर शुरू हो चुकी है। संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता,पार्टी के भीतर शक्ति-संतुलन,और आगामी चुनावों की दिशा तय करने वाला मुद्दा बन गया है। योगी आदित्यनाथ का बयान यह साफ कर देता है कि उत्तर प्रदेश में चुनावी लड़ाई सिर्फ विपक्ष से नहीं, बल्कि सिस्टम के भीतर भी लड़ी जा रही है। अब सवाल यही है क्या चुनाव आयोग स्थिति स्पष्ट करेगा? क्या केंद्र और राज्य एक सुर में आएंगे? या एस आई आर आने वाले चुनावों का सबसे बड़ा विवाद बनेगा? राजनीति की अगली चाल अब बेहद अहम होने जा रही है।


