– कलम की आवाज दबाने की साजिश या बढ़ता आपराधिक साहस, पत्रकारों की सुरक्षा पर फिर उठे सवाल
– शरद कटियार
मुरादाबाद में एक दैनिक अखबार के संपादक के घर पर हुई ताबड़तोड़ फायरिंग की घटना केवल एक आपराधिक वारदात नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर सीधा हमला भी मानी जा सकती है। कटघर थाना क्षेत्र के मछुआपुरा इलाके में गुरुवार को हुई इस घटना ने पूरे शहर को झकझोर कर रख दिया। जिस समय यह हमला हुआ, उस वक्त संपादक कामेश ठाकुर अपने परिवार के साथ घर में मौजूद थे। अचानक चली गोलियों की आवाज ने पूरे इलाके में दहशत फैला दी।
गनीमत रही कि इस हमले में किसी की जान नहीं गई और संपादक का परिवार बाल-बाल बच गया, लेकिन जिस तरह से दबंगों ने खुलेआम घर को निशाना बनाकर कई राउंड फायरिंग की, वह कानून व्यवस्था और पत्रकारों की सुरक्षा दोनों पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यह भी राहत की बात है कि पूरी घटना घर के बाहर लगे सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई है, जिससे पुलिस को जांच में मदद मिल सकती है।
पत्रकार समाज का वह वर्ग है जो सच को सामने लाने का जोखिम उठाता है। अक्सर सत्ता, माफिया और अपराधियों की काली करतूतों को उजागर करने के कारण पत्रकारों को धमकियों और हमलों का सामना करना पड़ता है। मुरादाबाद की यह घटना भी इसी कड़ी की एक चिंताजनक कड़ी प्रतीत होती है। सवाल यह उठता है कि आखिर अपराधियों के हौसले इतने बुलंद कैसे हो जाते हैं कि वे एक पत्रकार के घर तक पहुंचकर गोलियां चलाने का दुस्साहस कर देते हैं।
अगर किसी पत्रकार की कलम से सच सामने आता है और वह कुछ लोगों के हितों को चोट पहुंचाता है, तो उसका जवाब गोली से देना लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ है। ऐसे हमले केवल एक व्यक्ति पर नहीं बल्कि पूरे समाज की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला माने जाते हैं।
स्थानीय लोगों और पत्रकार संगठनों में इस घटना को लेकर आक्रोश देखा जा रहा है। पत्रकारों का कहना है कि अगर मीडिया कर्मी ही सुरक्षित नहीं होंगे तो समाज के मुद्दों को निर्भीकता से सामने लाना और भी कठिन हो जाएगा। इसलिए प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह इस मामले को अत्यंत गंभीरता से लेते हुए जल्द से जल्द आरोपियों को गिरफ्तार करे और उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करे।
यह भी जरूरी है कि पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर सरकार और प्रशासन ठोस नीति बनाए। देश के कई हिस्सों में पत्रकारों पर हमले की घटनाएं सामने आती रही हैं, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है। पत्रकार केवल खबर लिखने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह समाज की आवाज होता है।
मुरादाबाद की यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या सच लिखना अब खतरे से खाली नहीं रह गया है। अगर अपराधी इसी तरह निर्भीक होकर पत्रकारों को निशाना बनाते रहे, तो यह स्थिति समाज और लोकतंत्र दोनों के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकती है।
जरूरत इस बात की है कि प्रशासन इस मामले में त्वरित और सख्त कार्रवाई करे, ताकि अपराधियों को यह संदेश मिले कि पत्रकारों पर हमला करना किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरूरी है कि कलम की आवाज सुरक्षित और स्वतंत्र बनी रहे।


