दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को राष्ट्रपति और राज्यपाल की ओर से विधानसभा से पारित विधेयकों पर कार्रवाई से जुडे़ प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर अपना महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए साफ किया कि राज्यपाल किसी भी बिल को अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रख सकते। अदालत ने कहा कि राज्यपाल के पास केवल तीन विकल्प हैं—विधेयक को मंजूरी देना, उसे पुनर्विचार के लिए विधानसभा को लौटाना या राष्ट्रपति के पास भेजना।
तमिलनाडु में राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच विवाद के दौरान उठे इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि बिलों की मंजूरी के लिए समय-सीमा तय नहीं की जा सकती, क्योंकि यह शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लंघन होगा। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी मामले में अत्यधिक देरी होती है, तो न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है।
फैसले में पांच जजों की संविधान पीठ ने कहा कि राज्यपाल द्वारा बिलों को बिना प्रक्रिया पूरा किए रोके रखना सहयोगी संघवाद की भावना के विपरीत है। अदालत ने माना कि अनुच्छेद 200 में निर्दिष्ट प्रक्रिया का पालन किए बिना बिल रोकना संघीय ढांचे के लिए हानिकारक है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी दोहराया कि राज्यपाल के पास किसी बिल पर वीटो पावर नहीं है और राष्ट्रपति को भेजे गए विधेयकों पर तीन महीने में निर्णय लेना अनिवार्य है।
इस फैसले को राज्यों की विधायी प्रक्रिया के सम्मान और संघीय संतुलन को बनाए रखने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।






