नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश के जज निर्भय सिंह सुलिया की 2014 में हुई बर्खास्तगी को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमानत आदेशों में केवल कानूनी प्रावधान का उल्लेख न करना या कुछ आदेशों में त्रुटियां होना अपने आप में इतनी गंभीर गलती नहीं है कि जज को सेवा से हटाया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जज को बर्खास्त करने के लिए भ्रष्टाचार, पक्षपात या किसी गलत मंशा के ठोस सबूत होना आवश्यक है।

सुप्रीम कोर्ट का बयान:

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने कहा कि सिर्फ न्यायिक आदेशों के आधार पर अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि निडर और स्वतंत्र न्यायिक अधिकारी ही न्यायपालिका की मजबूत नींव हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि कुछ वकील या नाराज लोग झूठी शिकायतें करके जजों पर दबाव डालने की कोशिश कर सकते हैं।

मामले की पृष्ठभूमि:

निर्भय सिंह सुलिया ने 1987 में मध्य प्रदेश न्यायिक सेवा में प्रवेश किया था और 2003 में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश बने। 2011-12 में खरगोन पोस्टिंग के दौरान उनके खिलाफ शिकायत आई कि वे आबकारी मामलों में जमानत देने में भ्रष्टाचार कर रहे थे। शिकायत में आरोप था कि उन्होंने समान परिस्थितियों में अलग-अलग तरीके से जमानत दी। जांच के बाद चार जमानत आदेशों को आधार बनाकर हाईकोर्ट की सिफारिश पर उन्हें 2014 में बर्खास्त किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने राहत क्यों दी:

कोर्ट ने पाया कि जमानत आदेशों में केवल कानूनी धारा 59-A का उल्लेख नहीं था, लेकिन इससे भ्रष्टाचार सिद्ध नहीं होता। जमानत देने के पीछे किसी बाहरी दबाव या लाभ का कोई सबूत नहीं मिला। कोर्ट ने कहा कि यह अधिकतम न्यायिक गलती हो सकती है, लेकिन अनुचित लाभ या भ्रष्टाचार नहीं।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला जजों की स्वतंत्रता और न्यायिक प्रक्रिया की सुरक्षा के लिहाज से अहम माना जा रहा है।

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