सुप्रीम कोर्ट ने देश की चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाने से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है। यह नोटिस मतदान केंद्रों पर फिंगरप्रिंट और आईरिस आधारित बायोमेट्रिक पहचान प्रणाली लागू करने की मांग वाली याचिका पर जारी किया गया है। अदालत ने इस मुद्दे को गंभीर और व्यापक प्रभाव वाला बताते हुए संबंधित पक्षों से विस्तृत जवाब मांगा है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि फिलहाल इस तरह की व्यवस्था को आगामी विधानसभा चुनावों में लागू करना व्यावहारिक नहीं है। हालांकि, पीठ ने यह भी संकेत दिया कि भविष्य में होने वाले लोकसभा या विधानसभा चुनावों से पहले इस प्रणाली को लागू करने की संभावना पर विचार किया जा सकता है।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि वर्तमान चुनाव प्रणाली में फर्जी मतदान, डुप्लीकेट वोटिंग और ‘घोस्ट वोटिंग’ जैसी समस्याएं अभी भी मौजूद हैं, जो लोकतंत्र की निष्पक्षता को प्रभावित करती हैं। बायोमेट्रिक तकनीक के उपयोग से इन खामियों को काफी हद तक रोका जा सकता है और प्रत्येक मतदाता की सटीक पहचान सुनिश्चित की जा सकती है।
इस याचिका को अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने दायर किया है, जिसमें कहा गया है कि तकनीकी उपाय अपनाकर चुनाव प्रक्रिया को अधिक विश्वसनीय और सुरक्षित बनाया जा सकता है। उन्होंने अदालत से अनुरोध किया है कि सरकार और चुनाव आयोग को इस दिशा में ठोस कदम उठाने के निर्देश दिए जाएं।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और कुछ राज्यों को नोटिस जारी कर उनसे इस प्रस्ताव की व्यवहारिकता, कानूनी पहलुओं और संभावित चुनौतियों पर जवाब मांगा है। अदालत ने यह भी कहा कि इस तरह की प्रणाली लागू करने से पहले इसके तकनीकी, संवैधानिक और गोपनीयता से जुड़े पहलुओं पर गहन विचार जरूरी है।


