मेरठ
सुप्रीम कोर्ट ने अवैध निर्माण के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने 859 संपत्तियों में किए गए अवैध सेटबैक निर्माण को दो महीने के भीतर हटाने का आदेश दिया है। सेटबैक वह अनिवार्य खाली जगह होती है, जिसे इमारत के चारों ओर छोड़ना जरूरी होता है, लेकिन इन स्थानों पर अवैध निर्माण कर लिया गया था।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यह मामला केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश के लिए एक चेतावनी है। अदालत ने प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि समय रहते कार्रवाई की जाती, तो इतनी बड़ी समस्या पैदा नहीं होती। कोर्ट ने यह भी दोहराया कि कानून का राज किसी भी दबाव या विरोध के आगे नहीं झुक सकता।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए खास तौर पर स्कूलों, अस्पतालों और बैंकों के संचालन पर चिंता जताई। कोर्ट ने पूछा कि आखिर इन अवैध इमारतों में ऐसे संवेदनशील संस्थानों को चलाने की अनुमति किसने दी, जहां आम लोगों और बच्चों की सुरक्षा दांव पर लगी है।
इससे पहले, प्रशासन ने सेंट्रल मार्केट की 44 संपत्तियों को सील कर दिया था, जिसमें स्कूल, अस्पताल, बैंक और बैंक्वेट हॉल शामिल थे। हालांकि, सीलिंग की कार्रवाई के दौरान अधिकारियों को व्यापारियों के विरोध का सामना भी करना पड़ा। कोर्ट ने साफ कहा कि किसी भी तरह का जुर्माना या फीस देकर इस अवैध कब्जे को वैध नहीं किया जा सकता।
अदालत ने निर्देश दिया कि अवैध निर्माण हटाने से पहले संबंधित लोगों को 10 से 15 दिन का नोटिस दिया जाए। यदि वे स्वयं निर्माण नहीं हटाते हैं, तो प्रशासन ध्वस्तीकरण करेगा और उसका खर्च कब्जाधारकों से वसूला जाएगा। कोर्ट ने प्रशासन की लापरवाही को इस समस्या की बड़ी वजह बताते हुए भविष्य में सख्त निगरानी और कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।


