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Sunday, March 22, 2026

“छुट्टियों में भी लिखते हैं फैसले”: सुप्रीम कोर्ट के जजों ने बताया कार्यभार का दबाव, न्याय व्यवस्था में सुधार की जरूरत पर जोर

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नई दिल्ली| देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था सुप्रीम कोर्ट के जजों के बढ़ते कार्यभार और मानसिक दबाव को लेकर एक अहम चर्चा सामने आई है। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की राष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस के दौरान जस्टिस बी . वी . नागरत्ना और जस्टिस दीपानकर दत्ता ने खुलकर न्यायिक कार्यप्रणाली और जजों पर पड़ रहे दबाव को लेकर अपनी बात रखी। उनके बयानों ने न्यायपालिका के अंदरूनी कार्यभार और चुनौतियों की ओर देश का ध्यान खींचा है।
कॉन्फ्रेंस के दौरान “रीइमैजिनिंग ज्यूडिशियल गवर्नेंस: डेमोक्रेटिक जस्टिस के लिए संस्थाओं को मजबूत बनाना” विषय पर आयोजित पैनल चर्चा में जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि जजों का काम केवल अदालत में सुनवाई तक सीमित नहीं होता, बल्कि उनका असली कार्य कोर्ट के समय के बाद शुरू होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जज अक्सर अपनी छुट्टियों, वीकेंड और त्योहारों के दौरान भी लंबित मामलों के फैसले लिखने में लगे रहते हैं। उन्होंने कहा कि जब कोर्ट में फैसले तत्काल डिक्टेट नहीं किए जाते, तो जजों को शाम और रात के समय में बैठकर निर्णय तैयार करने पड़ते हैं।
जस्टिस नागरत्ना ने यह भी बताया कि जजों की भूमिका दोहरी होती है—एक ओर वे दिनभर कोर्ट में बैठकर मामलों की सुनवाई करते हैं, वहीं दूसरी ओर उन्हें उन मामलों के विस्तृत और कानूनी रूप से सटीक फैसले भी तैयार करने होते हैं। उन्होंने यह भी चिंता जताई कि देश में लंबित मामलों की बड़ी वजह सरकार खुद है, क्योंकि केंद्र और राज्य सरकारें सबसे बड़े मुकदमेबाज के रूप में सामने आती हैं। उन्होंने सरकारों से अपेक्षा जताई कि वे एक ‘आदर्श मुकदमेबाज’ की भूमिका निभाएं और अनावश्यक मुकदमेबाजी से बचें।
वहीं जस्टिस दीपांकर दत्ता ने भी जजों के मानसिक और शारीरिक दबाव पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि एक जज को सुबह 10:30 बजे से शाम 4 बजे तक लगातार पूरी एकाग्रता के साथ मामलों की सुनवाई करनी पड़ती है, जो किसी भी व्यक्ति के लिए अत्यधिक मानसिक परिश्रम का काम है। उन्होंने यह भी कहा कि इसके बाद भी जजों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे कोर्ट समय के बाहर भी काम करें और जल्द से जल्द फैसले सुनाएं, जो उचित नहीं है।
जस्टिस दत्ता ने समाज में जजों को लेकर बनी धारणा पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि लोग न्याय देने को एक दैवीय कार्य मानते हैं, जैसे भगवान ही सही और गलत का फैसला करता है, और उसी भूमिका में जजों को देख लिया जाता है। लेकिन जज भी इंसान हैं, जिनके दिमाग को भी आराम की जरूरत होती है। उन्होंने कहा कि यदि जजों पर अत्यधिक दबाव डाला जाएगा, तो इससे निर्णय की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है और गलती की संभावना बढ़ सकती है।
उन्होंने वकीलों और वादकारियों से भी अपील की कि वे जजों पर अनावश्यक दबाव न बनाएं कि हर मामले का फैसला उसी दिन सुना दिया जाए। उन्होंने कहा कि न्याय की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए जजों को पर्याप्त समय और मानसिक संतुलन मिलना जरूरी है।
कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट के जजों के इन बयानों ने न्यायपालिका की कार्यप्रणाली, जजों के कार्यभार और न्यायिक सुधार की आवश्यकता को लेकर एक नई बहस को जन्म दे दिया है। यह स्पष्ट संकेत है कि न्याय व्यवस्था को अधिक प्रभावी, संतुलित और मानवीय बनाने के लिए संरचनात्मक बदलावों की जरूरत महसूस की जा रही है।

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