यूपी के डीजीपी के इंस्पेक्टर हेमंत कुमार त्यागी की मौत: आत्महत्या या हत्या?

0
111

11 साल पुरानी जांच फाइल ने खोले बड़े सवाल
आतंकवादियों की संदिग्ध ट्रेनिंग के खुलासे के करीब पहुंच चुके थे इस्पेक्टर
हो जाती वर्ष 2015 मे तत्कालीन यूपी सरकार बदनाम

यूथ इंडिया समाचार
लखनऊ/फर्रुखाबाद। फर्रुखाबाद में वर्ष 2014-15 की संदिग्ध ट्रेनिंग का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। हजारों बाहरी युवकों की रहस्यमयी ट्रेनिंग, आवाज उठाने पर पर झूठे मुकदमे, दबाई गई जांच रिपोर्ट और उसी दौरान जांच अधिकारी इंस्पेक्टर हेमंत कुमार त्यागी की अचानक संदिग्ध मौत—इन घटनाओं की कड़ी आज भी कई बड़े नामों की तरफ इशारा कर रही है।
सबसे बड़ा सवाल कि जिस अधिकारी ने सच उजागर किया, क्या उसकी मौत सच को दफनाने के लिए कराई गई?
यूथ इंडिया के प्रधान संपादक शरद कटियार ने डीजीपी यूपी को भेजे प्रार्थना-पत्र में इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच की मांग की है, जो अब एक बार फिर राजनीतिक गलियारों से लेकर पुलिस महकमे तक हलचल मचा रही है। क्योंकि शरद कटियार पर कोतवाली मोहम्मदाबाद में दर्ज किए गए फर्जी 307 के मुकदमे की जांच और दौरान के जनपद पुलिस के चुनिंदा लोगों से ही कराए जाने के पक्ष में दबंग थे कुछ न्यायालय इलाहाबाद के आदेश के बाद जब शासन ने बड़ी मुश्किल में जांच सीबीसीआईडी कानपुर खंड को स्थानांतरित की तो माफिया तंत्र के राजनीतिक संरक्षक जनपद एटा की अलीगंज विधानसभा के सपा विधायक रामेश्वर सिंह यादव प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री अनीता सिंह को पत्र देने गए थे की जांच जिला पुलिस सही कराई जाए यह गैंग नहीं चाहता था कि पूरे प्रकरण की जांच गैर जनपद की पुलिस करें।
फर्रुखाबाद की ट्रेनिंग, शक की असली जड़
2014-15 में पांचाल घाट पर एक ऐसी ट्रेनिंग चल रही थी, जिस पर शुरू से ही सवाल उठते रहे न कोई सरकारी अनुमति, न प्रतिभागियों की पहचान, न कोई आधिकारिक निगरानी। लगभग 10, हजार बाहरी युवक आखिर किस ट्रेनिंग में जुटे थे? और रेलवे स्टेशन समेत पांचाल घाट पर उसे दौरान दो बम भी बरामद होने से खलबली मच गई थी।
जब शरद कटियार ने इस पर खबर प्रकाशित की कहीं आतंकवाद के साए में तो नहीं फर्रुखाबाद? तो खेल बिगड़ गया। खबर छपते ही फर्रुखाबाद का माफिया तंत्र और उसके राजनीतिक संरक्षक सक्रिय हो गए, और सिर्फ एक महीने में उन पर करीब डेढ़ दर्जन झूठे मुकदमे दर्ज करा दिए गए।
हेमंत त्यागी पहुंचे थे सच्चाई तक, और फिर मौत
तत्कालीन डीजीपी से शिकायत के बाद जांच शिकायत प्रकोष्ठ को मिली। इंस्पेक्टर हेमंत कुमार त्यागी टीम लेकर फर्रुखाबाद आए। सूर्या होटल रेलवे रोड फर्रुखाबाद में बयान दर्ज हुए, साक्ष्य जुटे और जांच टीम इस नतीजे पर पहुंच चुकी थी कि पत्रकार पर दर्ज मुकदमे झूठे और षड्यंत्र के तहत कराए गए।
लेकिन ठीक इसी दौरान इंस्पेक्टर हेमंत त्यागी की गोली लगने से मौत हो गई। सरकारी रिकॉर्ड ने इसे दुर्घटना बताया, लेकिन स्थानीय पुलिस, वकीलों और पत्रकारों के बीच यह बात आज भी चर्चा में है क्या यह हादसा नहीं, एक ‘साइलेंस ऑपरेशन’ था?
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि हेमंत त्यागी द्वारा जुटाई गई जांच रिपोर्ट आज तक सार्वजनिक नहीं हुई।जबकि जिला पुलिस द्वारा शासन को भेजी गई आख्या में इस जांच का स्पष्ट उल्लेख है।
मुकदमा अपराध संख्या 106 वर्ष 2015 कोतवाली मोहम्मदाबाद जनपद फर्रुखाबाद की केस डायरी में भी इसकी एंट्री मौजूद है।फिर यह फाइल किसके आदेश पर दबाई गई? इस पर कौन कब्जा जमाए बैठा है? और क्यों इस जांच को दबाया गया,और किसे डर था कि सच्चाई सामने आ गई तो नाम उजागर हो जाएंगे?
जिन लोगों के नाम आरोपों में बार-बार उभरते हैं, उनमें माफिया और प्रभावशाली राजनीतिक लोग शामिल बताए जाते हैं डॉ. अनुपम दुबे, संजीव परिया, अवधेश मिश्रा, चुन्नू, जग्गू यादव, डॉ. सुबोध यादव और पूर्व विधायक रामेश्वर सिंह यादव। अगर फाइल खुलती, तो कई चेहरों की मुखौटे उतर सकते थे।
शरद कटियार ने कहा 11 साल से इंसाफ के लिए भटक रहा हूं, पर जांच को दफनाकर रखा गया। यह सिर्फ मेरे खिलाफ साजिश नहीं, बल्कि सत्य के खिलाफ अपराध है।
हेमंत त्यागी की मौत आज भी एक अनसुलझी पहेली है। उनके द्वारा की गई जांच को दबाने के लिए उनकी हत्या कर दी गई थी,जिसने सच उजागर किया, वही खत्म हो गयाज् और पूरी फाइल गुम कर दी गई।
यह न सिर्फ एक पत्रकार पर हमला है,यह कानून और जांच प्रक्रिया पर सीधा प्रहार है। डीजीपी से मांग की है कि ‘सच बाहर आए, फाइल खोले बिना न्याय नहीं’ कटियार का कहना है हेमंत त्यागी की मौत और दबी हुई रिपोर्ट—दोनों साबित करती हैं कि सच को जानबूझकर मारा गया। अब जांच ही उस सच को जिंदा कर सकती है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here