
कैसे बन गए शंकराचार्य…24 घंटे में दें जवाब, अविमुक्तेश्वरानंद को माघ मेला प्राधिकरण का नोटिस
प्रयागराज। माघ मेला प्राधिकरण द्वारा स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ‘शंकराचार्य’ उपाधि के प्रयोग पर भेजे गए नोटिस के बाद संत समाज और अनुयायियों में गहरा आक्रोश है। संतों का कहना है कि शंकराचार्य की परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही है और यह केवल एक पद नहीं, बल्कि सनातन धर्म की सर्वोच्च आध्यात्मिक परंपरा का प्रतीक है। ऐसे में प्रशासनिक नोटिस के जरिए इस उपाधि पर सवाल उठाना आस्था और धार्मिक स्वतंत्रता पर आघात है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थकों का कहना है कि वे लंबे समय से ज्योतिष्पीठ की परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं और संत समाज का एक बड़ा वर्ग उन्हें शंकराचार्य के रूप में स्वीकार करता है। उनका तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट में मामला विचाराधीन होने का अर्थ यह नहीं है कि किसी धर्माचार्य की पहचान और परंपरागत सम्मान को प्रशासन अपने स्तर पर चुनौती देने लगे।
मौनी अमावस्या के महास्नान के दिन शोभायात्रा रोके जाने के बाद जिस तरह से विवाद बढ़ा, उसे भी शंकराचार्य के समर्थक प्रशासन की असंवेदनशीलता बता रहे हैं। उनका कहना है कि यदि सुरक्षा की चिंता थी तो संवाद के माध्यम से समाधान निकाला जा सकता था, न कि धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाले कदम उठाए जाते।
संत समाज ने यह भी कहा कि पहिया लगी पालकी को लेकर आपत्ति के नाम पर पूरे घटनाक्रम को मोड़ देना उचित नहीं है। असल मुद्दा यह है कि एक प्रतिष्ठित धर्माचार्य के सम्मान और अधिकारों को नजरअंदाज किया गया। समर्थकों ने मांग की है कि माघ मेला प्राधिकरण नोटिस वापस ले, शंकराचार्य की परंपरा का सम्मान करे और भविष्य में ऐसे मामलों में धार्मिक संवेदनशीलता के साथ निर्णय ले, ताकि आस्था और प्रशासन के बीच टकराव न बढ़े।





