– स्वतंत्र देव सिंह : सत्ता में रहते हुए भी जाति से ऊपर खड़े नेतृत्व का नाम
शरद कटियार
महोबा के चरखारी में जल संकट को लेकर मंत्री और विधायक के बीच उत्पन्न राजनीतिक टकराव को जिस तरह कुछ लोग जातिगत चश्मे से देखने की कोशिश कर रहे हैं, वह न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि इस पूरे प्रकरण की मूल भावना से ध्यान भटकाने वाला भी है। एक जनसमस्या को कुर्मी बनाम लोधा जैसे संकीर्ण खांचे में बाँटना न तो लोकतंत्र के हित में है और न ही समाज के।
यह मुद्दा जाति का नहीं, पानी का था।यह संघर्ष वर्चस्व का नहीं, जवाबदेही का था।
चरखारी का मामला किसी निजी हित या व्यक्तिगत टकराव से जुड़ा नहीं था। यह वह मुद्दा था, जिसे क्षेत्रीय विधायक पहले ही दो बार विधानसभा के सदन में उठा चुके थे। जब सदन में सवालों का संतोषजनक उत्तर नहीं मिला, तब वही सवाल सड़क पर जनता की आवाज बनकर सामने आया।
लोकतंत्र में यह न तो असंवैधानिक है और न ही अनुशासनहीनता,
बल्कि यह जनप्रतिनिधि होने का धर्म है।स्वतंत्र देव सिंह सत्ता में संयम और जाति से दूरी के प्रतीक निष्पक्ष नेता हैं।
इस पूरे घटनाक्रम में यदि किसी व्यक्तित्व को सबसे अधिक समझदारी और संतुलन के साथ देखा गया, तो वह हैं स्वतंत्र देव सिंह।प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष रह चुके स्वतंत्र देव सिंह आज उत्तर प्रदेश सरकार में जल शक्ति मंत्री के रूप में एक अत्यंत जिम्मेदार पद पर आसीन हैं। वह केवल मंत्री नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के भरोसेमंद सहयोगियों में गिने जाते हैं।ऐसे नेता जो सत्ता के गलियारों में “छाया” की तरह मुख्यमंत्री के साथ रहते हैं।
इसके बावजूद स्वतंत्र देव सिंह की राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि उन्होंने कभी जाति को अपना राजनीतिक हथियार नहीं बनाया।
स्वतंत्र देव सिंह उन गिने-चुने नेताओं में हैं, जिन्होंने कभी अपने सजातियों को सत्ता का लाभ दिलाने का मंच नहीं बनाया, यहां तक की व्यक्तिगत रूप से भी यदि उनके सजातीय करीबी उनसे मिलने भी गए, तो उन्होंने अपनों से भी वही बर्ताव किया जैसा आम जनमानस से करते हैं कभी किसी को विशेष तरजीह न देकर अपने सरकारी आवास पर गुड़ पानी खिला कर ही चलता किया, उन्होंने अपने सजातियों के वह काम भी नहीं किये जो जायज होते, क्योंकि अगर काम कर देंगे तो सजातीय प्रशंसा के पुल बंधेंगे और यही उनके ऊपर जातिवाद का बट्टा लगने का कारण बनेगा।
उन्होंने सदैव अपने को पार्टी धर्म और राजधर्म को व्यक्तिगत समीकरणों से ऊपर रखा
यदि वह जाति की राजनीति में विश्वास रखते, तो अपने राजनीतिक जीवन में अपनी ही जाति के लोगों को आगे बढ़ाने में कोई बाधा नहीं थी। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने अवसर मिलने पर सर्वसमाज, विशेषकर राष्ट्र और संगठन के प्रति निष्ठावान वर्गों को आगे बढ़ाया। उपेक्षा का शिकार रहे ब्राह्मण समाज को दिल खोलकर नेतृत्व से जोड़ा मजबूती दी।
यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि स्वतंत्र देव सिंह ने जब-जब अवसर पाया, उन्होंने ब्राह्मण समाज को प्रशासन और संगठन में सम्मानजनक प्रतिनिधित्व दिलाने में कोई संकोच नहीं किया। यह उनका विस्तृत सामाजिक दृष्टिकोण दर्शाता है, न कि संकीर्ण जातीय सोच।
यही कारण है कि उन्हें किसी एक जाति का नहीं, बल्कि संगठन का नेता माना जाता है।
आज सोशल मीडिया के दौर में हर घटना को तुरंत जाति, धर्म या वर्ग में बाँट देना आसान हो गया है। लेकिन यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करती है। स्वतंत्र देव सिंह जैसे नेता, जिन्होंने स्वयं जीवन भर जातिवाद से दूरी बनाए रखी, उनके नाम पर जातिगत मोर्चाबंदी करना न केवल अनुचित है, बल्कि उनके राजनीतिक चरित्र के साथ भी अन्याय है। वह कुर्मी समाज के नेता नहीं सर्व समाज के हैं उन्होंने स्वयं कभी अपने सजातियों को सार्वजनिक रूप से अपने पास नहीं भटकने दिया।
चरखारी का प्रकरण इस बात का उदाहरण है कि जब जनसमस्या बड़ी होती है, तो वह सत्ता के भीतर भी सवाल खड़े करती है।और जब नेतृत्व परिपक्व होता है, तो वह उन सवालों को सुनता भी है।स्वतंत्र देव सिंह ने न तो जाति का सहारा लिया, न टकराव को बढ़ाया। उन्होंने एक जिम्मेदार मंत्री की तरह स्थिति को समझा, स्वीकार किया और समाधान का आश्वासन भी दिया।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम नेतृत्व को जाति में नहीं, चरित्र में परखें।और स्वतंत्र देव सिंह इस कसौटी पर खरे उतरते है,एक ऐसे नेता के रूप में, जो सत्ता में रहकर भी समाज को बाँटने से इंकार करता है।






