शरद कटियार
बजट 2026–27 को अगर एक वाक्य में समझा जाए तो यह सरकार की प्राथमिकताओं का खुला बयान है—राजकोषीय अनुशासन, ढांचागत निवेश और संस्थागत विस्तार; लेकिन इसके साथ ही घरेलू आय पर बढ़ते दबाव से तत्काल राहत का अभाव। यह बजट “आज की तकलीफ” नहीं, “कल की क्षमता” पर दांव लगाता दिखता है।
सरकार का तर्क साफ है। वैश्विक अनिश्चितताओं के दौर में खर्च की दिशा ऐसी होनी चाहिए जो उत्पादकता बढ़ाए, लॉजिस्टिक्स सस्ती करे और निवेश आकर्षित करे। इसी सोच के तहत हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर, शहरी विकास पर भारी पूंजीगत व्यय, जलमार्गों का विस्तार और डिजिटल–मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम पर जोर दिया गया। ये फैसले अर्थव्यवस्था की रीढ़ मजबूत कर सकते हैं—पर समय लेते हैं।
यहीं से असहज सवाल पैदा होता है। घर की रसोई और कारखाने की मशीन—दोनों को एक साथ संभालना होता है। बजट ने मशीन को प्राथमिकता दी, रसोई को धैर्य रखने को कहा। इनकम टैक्स स्लैब में बदलाव न होना, महंगाई से जूझ रहे मध्यम वर्ग के लिए निराशाजनक रहा। रिटर्न फाइलिंग की समय-सीमा बढ़ना प्रशासनिक सहूलियत है, लेकिन यह खर्च–आय के अंतर को नहीं पाटती।
स्वास्थ्य के मोर्चे पर तस्वीर तुलनात्मक रूप से बेहतर है। गंभीर बीमारियों की दवाओं पर शुल्क में राहत और मेडिकल हब जैसी घोषणाएं मानवीय जरूरत को स्वीकार करती हैं। शिक्षा–कौशल में डिजिटल लैब और महिला छात्रावास भविष्य की तैयारी हैं। फिर भी रोजगार का प्रश्न यथावत है—कौशल तभी फलता है जब नौकरी की मांग साथ चले।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं इसी तनाव को रेखांकित करती हैं। कांग्रेस ने बजट को “फीका” बताते हुए कहा कि महंगाई, बेरोजगारी और मध्यम वर्ग को नजरअंदाज किया गया है। पार्टी का तर्क है कि कॉर्पोरेट–इंफ्रास्ट्रक्चर संतुलन आम नागरिक के पक्ष में झुका नहीं। समाजवादी पार्टी ने इसे “चुनिंदा लाभार्थियों” का दस्तावेज़ कहा और किसानों, पेंशनरों व यूपी के विकास पर ठोस उत्तर मांगे। विपक्ष की यह आलोचना उस खाली जगह की ओर इशारा करती है, जहाँ तत्काल राहत अपेक्षित थी।
सरकार का बचाव भी समझ में आता है। राजकोषीय घाटा, कर्ज की लागत और वैश्विक जोखिमों के बीच खर्च का चुनाव कठिन होता है। पर लोकतंत्र में नीति का मूल्यांकन केवल दीर्घकालिक वादों से नहीं, वर्तमान जीवन-स्तर से भी होता है। जब बिजली, परिवहन और खाद्य खर्च दबाव में हों, तब “धैर्य” का संदेश राजनीतिक रूप से महंगा पड़ सकता है।
निष्कर्षतः बजट 2026 एक रणनीतिक बजट है—आर्थिक इंजन को तेज करने का प्रयास, पर सहयात्रियों की थकान को कम करने के औजार कम। अगर सरकार अगले कदम में लक्षित कर-राहत, शहरी–ग्रामीण महंगाई नियंत्रण और रोजगार-सृजन के स्पष्ट टाइमलाइन दे देती है, तो यह संतुलन सुधर सकता है। वरना बहस यही रहेगी—मजबूत ढांचा बन रहा है, लेकिन घरों की जेब कब मजबूत होगी?
बजट 2026 : मजबूत ढांचा, कमजोर जेब—सरकार का चुनाव


