प्रतापगढ़ में स्कूल के लिए निकली तीन नाबालिग छात्राओं का 48 घंटे बाद भी लापता रहना उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था और महिला सुरक्षा के दावों पर गहरा सवाल खड़ा करता है। यह कोई साधारण घटना नहीं है, बल्कि उस जमीनी हकीकत का आईना है, जिसे सरकार अक्सर आंकड़ों, अभियानों और नारों में ढकने की कोशिश करती रही है।
तीनों छात्राएं पारा हमीदपुर, अंतू थाना क्षेत्र की रहने वाली हैं और रोज़ की तरह इंटर कॉलेज जाने के लिए घर से निकली थीं। न कोई विवाद था, न ही किसी तरह की धमकी या आशंका। इसके बावजूद उनका अचानक लापता हो जाना यह दर्शाता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में बेटियों की सुरक्षा आज भी भरोसे के काबिल नहीं है। यदि स्कूल जाना भी सुरक्षित नहीं, तो सरकार के “महिला सुरक्षा सर्वोपरि” जैसे दावे किस आधार पर किए जा रहे हैं?
प्रदेश सरकार वर्षों से मिशन शक्ति को महिला सुरक्षा की ढाल बताती आ रही है। हर जिले में महिला हेल्पडेस्क, त्वरित पुलिस कार्रवाई और निगरानी तंत्र के दावे किए जाते हैं। लेकिन प्रतापगढ़ की यह घटना बताती है कि यह मिशन अधिकतर फाइलों और पोस्टरों तक सीमित रह गया है। ज़मीनी स्तर पर न तो पुलिस की सक्रियता दिख रही है और न ही किसी ठोस परिणाम की झलक।
पुलिस का यह कहना कि कॉल डिटेल खंगाली जा रही है, सीसीटीवी फुटेज देखे जा रहे हैं और आसपास के जिलों को अलर्ट किया गया है, सुनने में ठीक लगता है, लेकिन सच्चाई यह है कि यह सब लापता मामलों में की जाने वाली न्यूनतम प्रक्रिया है। सबसे अहम पहले 24 घंटे बीत चुके हैं और 48 घंटे बाद भी पुलिस के हाथ खाली हैं। परिजन लगातार थानों के चक्कर काट रहे हैं और हर गुजरते घंटे के साथ उनकी चिंता बढ़ती जा रही है।
इस घटना ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर जवाबदेही किसकी है। क्या यह सिर्फ स्थानीय पुलिस की नाकामी है, या फिर वह शासन-प्रशासन जो महिला सुरक्षा को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि बताता है? जब सरकार खुद मिशन शक्ति को सफलता का मॉडल बताती है, तो ऐसे मामलों में उसकी सीधी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
ग्रामीण इलाकों में न तो नियमित गश्त है, न ही स्कूल जाने वाली छात्राओं की सुरक्षा को लेकर कोई ठोस व्यवस्था। यही कारण है कि अपराधी बेखौफ हैं और बेटियां असुरक्षित। यदि समय रहते इन घटनाओं पर सख्त और पारदर्शी कार्रवाई नहीं हुई, तो मिशन शक्ति जैसे अभियान जनता की नजर में खोखले नारे बनकर रह जाएंगे।
प्रतापगढ़ की यह घटना सरकार के लिए एक चेतावनी है। अब जरूरत है बयानबाज़ी और प्रचार से आगे बढ़कर तत्काल, प्रभावी और संवेदनशील कार्रवाई की। लापता छात्राओं की सुरक्षित बरामदगी सिर्फ परिजनों की नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश की मांग है। जब तक बेटियां सुरक्षित नहीं होंगी, तब तक किसी भी सरकार के विकास और सुशासन के दावे अधूरे।






