शरद कटियार
सोना भारत में केवल एक धातु नहीं है। यह भरोसे, परंपरा, सुरक्षा और भविष्य की गारंटी का प्रतीक रहा है। पीढ़ियों से भारतीय समाज में सोना संकट के समय सहारा माना गया, बेटी की शादी का आधार बना और बचत का सबसे सुरक्षित साधन समझा गया। लेकिन आज वही सोना धीरे-धीरे आम आदमी की पहुंच से बाहर होता जा रहा है।
बीते कुछ समय से सोने की कीमतें जिस रफ्तार से बढ़ी हैं, उसने न केवल सर्राफा बाजार को प्रभावित किया है, बल्कि मध्यम और निम्न वर्ग की आर्थिक योजनाओं को भी झकझोर दिया है। हालात यह हैं कि सोना अब आभूषण कम और निवेश का महंगा साधन ज्यादा बनता जा रहा है।
महंगाई का असली कारण क्या है
सोने की बढ़ती कीमतों को केवल घरेलू मांग से जोड़कर देखना सही नहीं होगा। इसके पीछे वैश्विक आर्थिक हालात सबसे बड़ा कारण हैं। दुनिया भर में आर्थिक अनिश्चितता, युद्ध जैसे हालात, शेयर बाजारों में उतार-चढ़ाव और महंगाई के डर ने निवेशकों को सुरक्षित विकल्पों की ओर मोड़ा है। ऐसे समय में सोना हमेशा पहली पसंद बनता है।
इसके साथ ही डॉलर में कमजोरी, केंद्रीय बैंकों द्वारा बड़े पैमाने पर सोने की खरीद और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती मांग ने कीमतों को लगातार ऊपर धकेला है। भारत चूंकि अपनी जरूरत का अधिकांश सोना आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों का सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ता है।
निवेश का सोना, आभूषण से आगे
एक समय था जब सोना मुख्य रूप से गहनों के रूप में खरीदा जाता था। आज तस्वीर बदल चुकी है। अब सोना निवेश उत्पाद बन चुका है। गोल्ड ईटीएफ, डिजिटल गोल्ड और सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड जैसे विकल्पों ने सोने को आम बाजार से निकालकर वित्तीय बाजार में स्थापित कर दिया है।
इस बदलाव का असर यह हुआ है कि कीमतें निवेशकों की रणनीति से तय होने लगी हैं, न कि आम खरीदार की जरूरत से। नतीजा यह है कि सर्राफा बाजार में भीड़ कम है, लेकिन कीमतें ऊंचाई पर बनी हुई हैं।
आम आदमी पर सीधा असर
सोने की बढ़ती कीमतों का सबसे बड़ा बोझ मध्यम वर्ग पर पड़ा है। शादी-विवाह जैसे पारंपरिक अवसरों पर अब पहले जैसी खरीदारी नहीं हो पा रही। लोग या तो वजन कम कर रहे हैं या खरीदारी टाल रहे हैं। कई परिवारों के लिए सोना अब “ज़रूरी” नहीं, बल्कि “लक्ज़री” बनता जा रहा है।
ग्रामीण इलाकों में, जहां सोना सामाजिक सुरक्षा का बड़ा साधन माना जाता था, वहां भी खरीदारी में भारी कमी देखी जा रही है। यह संकेत है कि महंगाई केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि ज़मीनी हकीकत में महसूस की जा रही है।
सरकार और नीति का सवाल
सोने की कीमतें सीधे सरकार के नियंत्रण में नहीं होतीं, लेकिन आयात शुल्क, कर नीति और वैकल्पिक निवेश साधनों को बढ़ावा देकर दबाव को कुछ हद तक कम किया जा सकता है। सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड जैसी योजनाएं इसी दिशा में एक प्रयास हैं, ताकि भौतिक सोने की मांग घटे और विदेशी मुद्रा पर दबाव कम हो।
हालांकि, यह भी सच है कि जब तक वैश्विक अनिश्चितता बनी रहेगी, तब तक सोने की कीमतों पर पूरी तरह लगाम लगाना आसान नहीं होगा।
सोने की मौजूदा स्थिति यह साफ संकेत देती है कि आने वाले समय में यह और महंगा हो सकता है। ऐसे में आम आदमी को अपनी सोच बदलनी होगी। परंपरा के साथ-साथ व्यावहारिकता जरूरी है। निवेश के लिए सोने के वैकल्पिक साधनों पर विचार करना और जरूरत के अनुसार ही आभूषण खरीदना समय की मांग है।
सोना आज भी सुरक्षित है, लेकिन सस्ता नहीं।वह अब भावनाओं से ज्यादा वैश्विक अर्थव्यवस्था से संचालित हो रहा है।अगर यही रुझान जारी रहा, तो आने वाले वर्षों में सोना भारतीय समाज में परंपरा का प्रतीक कम और अमीरों का निवेश साधन ज्यादा बन जाएगा।यह बदलाव केवल बाजार का नहीं, समाज की आर्थिक दिशा का भी संकेत है।

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