भारत जैसे देश में, जहां अंतरिक्ष तक पहुंच बनाने की क्षमता है, वहां वी आई पी विमान और हेलिकॉप्टर हादसे बार-बार एक असहज सवाल खड़ा करते हैं—क्या समस्या तकनीक की है, या फिर व्यवस्था की? हर बड़े हादसे के बाद कुछ दिन शोक, कुछ दिन बयान, और फिर वही चुप्पी। लेकिन हादसे रुकते नहीं। इसका मतलब साफ है कि कहीं न कहीं मूल समस्या को छुआ ही नहीं जा रहा।
बीते वर्षों में भारत ने कई ऐसे हादसे देखे, जिनमें देश के शीर्ष पदों पर बैठे लोग अपनी जान गंवा चुके हैं।
इनमें प्रमुख नाम हैं जनरल बिपिन रावत, देश के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ; वाई. एस. राजशेखर रेड्डी, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री; जी. एम. सी. बालयोगी, लोकसभा अध्यक्ष;डोरजी खांडू, अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री। ये सभी हादसे अलग-अलग समय, अलग-अलग स्थान और अलग-अलग परिस्थितियों में हुए, लेकिन जांच रिपोर्टों के निष्कर्ष लगभग एक जैसे रहे—खराब मौसम, कम दृश्यता, तकनीकी सीमाएं, मानवीय चूक। जब निष्कर्ष हर बार एक जैसे हैं, तो यह संयोग नहीं बल्कि सिस्टम में मौजूद स्थायी कमजोरी का संकेत है।
पहला सवाल: क्या टेक्नोलॉजी कमजोर है? भारत की एविएशन क्षमता पर सवाल उठाना आसान है, लेकिन तथ्य यह है कि भारत के पास सैटेलाइट आधारित मौसम निगरानी आधुनिक रडार सिस्टम, प्रशिक्षित पायलट,उन्नत एयरक्राफ्ट और हेलिकॉप्टर डीजीसीए और आईएएफ जैसे संस्थागत ढांचे सब कुछ मौजूद है।
फिर सवाल उठता है— अगर टेक्नोलॉजी है, तो हादसे क्यों?, असल समस्या: टेक्नोलॉजी का उपयोग नहीं, दबाव का उपयोग, समस्या टेक्नोलॉजी की नहीं, बल्कि निर्णय लेने की स्वतंत्रता की कमी की है।वी आई पी उड़ानों में अक्सर यह मान लिया जाता है कि—कार्यक्रम तय है,समय महत्वपूर्ण है वीआईपी को हर हाल में पहुंचना है यही सोच सुरक्षा को पीछे धकेल देती है।
पायलट चाहे कितना भी अनुभवी हो, जब ऊपर से संकेत साफ हो कि उड़ान रद्द नहीं हो सकती, तो जोखिम को स्वीकार कर लिया जाता है।यहीं से दुर्घटना की नींव पड़ती है।वीआईपी प्रोटोकॉल बनाम सुरक्षा,भारत में वीआईपी प्रोटोकॉल बेहद सख्त और समयबद्ध है। लेकिन सवाल यह है—क्या प्रोटोकॉल सुरक्षा से बड़ा हो सकता है? आम नागरिक की फ्लाइट खराब मौसम में रद्द हो सकती है, लेकिन वीआईपी उड़ानों में अक्सर विकल्प खोजे जाते हैं—ऊंचाई बदलो,रास्ता बदलो,समय समायोजित करो,ये सारे विकल्प जोखिम बढ़ाते हैं। जब निर्णय यह होना चाहिए कि उड़ान नहीं होगी, तब निर्णय होता है कि उड़ान कैसे होगी।
अधिकांश वीआईपी हादसे चार्टर्ड विमानों और हेलिकॉप्टरों से जुड़े हैं। ये नियमित यात्री विमानों की तरह निरंतर निगरानी में नहीं रहते। इनमें—उड़ान आवृत्ति कम तकनीकी निरीक्षण का अंतराल ज्यादा,मौसम सीमाओं का दायरा संकरा,होता है।जब इन्हीं साधनों का उपयोग संवैधानिक पदों पर बैठे लोग करते हैं, तो जोखिम कई गुना बढ़ जाता है। हर हादसे के बाद जांच आयोग बनता है।रिपोर्ट आती है। कुछ सिफारिशें होती हैं। लेकिन सवाल यह है—कितनी रिपोर्टें सार्वजनिक होती हैं? कितनी सिफारिशें जमीन पर उतरती हैं? जब तक रिपोर्टें सार्वजनिक नहीं होंगी, तब तक—जवाबदेही तय नहीं होगी। सुधार की निगरानी नहीं होगी वही गलतियां दोहराई जाती रहेंगी
यह चुप्पी ही सिस्टम की सबसे बड़ी कमजोरी है। मानवीय चूक या संस्थागत दबाव? अक्सर कहा जाता है—मानवीय चूक।लेकिन यह शब्द बहुत सुविधाजनक है।यह जिम्मेदारी को व्यक्ति पर डाल देता है, जबकि असल में दबाव संस्थागत होता है। पायलट अकेले निर्णय नहीं लेते उन पर—प्रशासनिक दबाव,समय का दबाव,प्रोटोकॉल का दबाव होता है।इस दबाव में लिया गया फैसला, भले ही तकनीकी रूप से गलत हो, लेकिन संस्थागत रूप से समझा हुआ माना जाता है। क्या वीआईपी की जान आम नागरिक से ज्यादा कीमती है? यह सवाल असहज है, लेकिन जरूरी है।सुरक्षा मानकों में अगर कोई अंतर है, तो वह खतरनाक है। हर उड़ान वीआईपी हो या आम नागरिक—एक जैसे नियमों पर चलनी चाहिए। अगर मौसम खराब है, तो उड़ान रद्द होनी चाहिए—बिना किसी अपवाद के। समाधान नए हेलिकॉप्टर खरीदना नहीं है।समाधान नए रडार लगाने में भी नहीं है।
जांच रिपोर्टों की सार्वजनिकता
लापरवाही पर व्यक्तिगत जवाबदेही जब तक निर्णय लेने वाला व्यक्ति सुरक्षित महसूस नहीं करेगा कि उड़ान रद्द करना भी स्वीकार्य है, तब तक हादसे रुकेंगे नहीं। भारत में टेक्नोलॉजी की कमी नहीं है।कमी है सिस्टम की ईमानदारी में।कमी है सुरक्षा को प्राथमिकता देने की राजनीतिक इच्छाशक्ति में। लेकिन हर हादसे के बाद सिस्टम बदलना मुश्किल—और जरूरी—है। जब तक वीआईपी उड़ानों को भी आम उड़ानों की तरह सख्त सुरक्षा अनुशासन में नहीं बांधा जाएगा, तब तक अगला हादसा सिर्फ समय का इंतजार करेगा।और तब फिर हम यही पूछेंगे—क्या यह टेक्नोलॉजी की कमी थी? जबकि सच यह होगा यह सिस्टम की नाकामी थी।
(लेखक यूथ इंडिया न्यूज ग्रुप के संस्थापक हैं।)






