गणतंत्र दिवस केवल तिरंगे की सलामी और परेड का दिन नहीं है, यह उस संविधान का उत्सव है जो राज्य, सत्ता और नागरिक—तीनों को मर्यादाओं में बाँधता है। ऐसे दिन एक प्रशासनिक अधिकारी का सार्वजनिक इस्तीफा, और उसके बाद राज्य की कठोर दंडात्मक कार्रवाई, सामान्य घटना नहीं कही जा सकती। बरेली के तत्कालीन सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री का इस्तीफा एक व्यक्तिगत निर्णय भर नहीं था; वह प्रशासनिक आचरण, वैचारिक असहमति, सत्ता की प्रतिक्रिया और समाज में फैलते जातीय विमर्श—इन सबका संगम बन गया। यही कारण है कि यह प्रकरण केवल एक अफसर तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि पूरे तंत्र और सामाजिक चेतना को कटघरे में खड़ा करता है।
सबसे बुनियादी प्रश्न से शुरुआत होनी चाहिए—अधिकारी की कोई जाति नहीं होती। प्रशासनिक सेवा में प्रवेश करते ही व्यक्ति की पहचान संविधान से जुड़ जाती है। उसका नाम, उसका पद और उसका हस्ताक्षर—तीनों राज्य का प्रतिनिधित्व करते हैं। जब किसी अधिकारी के फैसले, असहमति या इस्तीफे को उसकी जाति से जोड़कर देखा जाता है, तो यह न केवल उस व्यक्ति के प्रति अन्याय है, बल्कि संविधान की आत्मा पर भी प्रहार है। जातीय चश्मा प्रशासन पर चढ़ते ही निष्पक्षता धुंधली हो जाती है और राज्य की विश्वसनीयता कमजोर पड़ती है।
अलंकार अग्निहोत्री ने जिन मुद्दों को लेकर असहमति जताई—चाहे वह विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियम हों या शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़ा विवाद—वे नीतिगत और वैचारिक प्रकृति के प्रश्न हैं। लोकतंत्र में नीतियों पर असहमति अपराध नहीं है; बल्कि यह लोकतंत्र का प्राण है। लेकिन प्रशासनिक सेवा में यह असहमति कैसे और कहाँ व्यक्त की जाए—यहीं से विवाद शुरू होता है। सेवा नियम स्पष्ट हैं कि अधिकारी सार्वजनिक मंचों पर सरकार की नीतियों के विरुद्ध राजनीतिक या वैचारिक बयान नहीं दे सकते। यही अनुशासन प्रशासन को सुचारु रखता है।
सरकार द्वारा निलंबन की कार्रवाई इसी अनुशासन के तर्क पर आधारित बताई जा सकती है। राज्य का यह कहना कि “नियम सर्वोपरि हैं”—अपने आप में गलत नहीं है। कोई भी सरकार यह नहीं चाहती कि प्रशासनिक ढाँचा सार्वजनिक टकराव का अखाड़ा बने। परंतु यहाँ सवाल नीयत से अधिक प्रक्रिया और संदेश का है। क्या हर असहमति का जवाब दंड ही होना चाहिए? क्या संवाद, चेतावनी या संस्थागत विमर्श के रास्ते पूरी तरह बंद कर दिए जाने चाहिए? यदि ऐसा है, तो यह प्रवृत्ति आगे चलकर प्रशासन को “हां में हां” कहने वाली मशीन में बदल देगी—जो लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं।
इस पूरे प्रकरण में सबसे चिंताजनक पहलू वह है, जहाँ मुद्दे से ध्यान हटाकर पहचान पर हमला किया गया। नीतियों पर बहस करने के बजाय यह तय करने की कोशिश की गई कि अधिकारी “किस वर्ग” से आता है और उसकी मंशा क्या थी। यही वह मोड़ है जहाँ वैचारिक विमर्श जातीय विद्वेष में बदल जाता है। इससे न तो सरकार को लाभ होता है, न प्रशासन को, और न ही समाज को। उलटे, यह विभाजन को और गहरा करता है—और असली सवाल, यानी नीति की गुणवत्ता और संवैधानिक मर्यादा, पीछे छूट जाते हैं।
यह भी सच है कि एक प्रशासनिक अधिकारी का सार्वजनिक इस्तीफा अपने आप में एक गंभीर कदम होता है। इस्तीफा व्यवस्था से बाहर निकलने का संकेत देता है—और यही कारण है कि इसे ‘अंतिम विकल्प’ माना जाता है। यदि किसी अधिकारी को लगता है कि व्यवस्था में उसकी बात सुनी नहीं जा रही, तो यह प्रशासन के भीतर संवाद तंत्र की कमजोरी को भी उजागर करता है। यह आत्ममंथन का विषय होना चाहिए—केवल व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था के लिए।
उत्तर प्रदेश की सरकार, जिसका नेतृत्व योगी आदित्यनाथ कर रहे हैं, अनुशासन और सख्त प्रशासन के लिए जानी जाती है। यह उसकी राजनीतिक पहचान भी है। लेकिन मजबूत शासन का अर्थ केवल दंडात्मक कार्रवाई नहीं होता; मजबूत शासन वह होता है जो असहमति को समय रहते सुन ले, संस्थागत रास्ते दे, और सार्वजनिक टकराव की नौबत न आने दे। सख्ती और संवेदनशीलता—दोनों का संतुलन ही स्थायी समाधान देता है।
अग्निहोत्री प्रकरण हमें यह भी सिखाता है कि सामाजिक विमर्श कितना जल्दी भटक सकता है। जब प्रशासनिक मामलों को जातीय रंग दिया जाता है, तो यह परंपरा बन जाती है—और फिर हर अगला विवाद और अधिक जहरीला हो जाता है। आज एक अधिकारी है, कल कोई शिक्षक, कोई डॉक्टर या कोई न्यायिक अधिकारी—सब पर यही चश्मा चढ़ा दिया जाएगा। यह रास्ता अंततः समाज को कमजोर करता है और राज्य की संस्थाओं को संदेह के घेरे में लाता है।
असहमति लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन उसका मंच और तरीका संवैधानिक मर्यादा में होना चाहिए।
अनुशासन प्रशासन की रीढ़ है, लेकिन वह संवाद का विकल्प नहीं हो सकता।और सबसे महत्वपूर्ण—अधिकारी की कोई जाति नहीं होती। जब तक हम इस सत्य को स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक हर बड़ा मुद्दा छोटे खांचों में सिमटता रहेगा।
आज आवश्यकता है कि इस प्रकरण को सनसनी या पहचान की राजनीति से ऊपर उठकर देखा जाए—नीति, प्रक्रिया और संविधान के आईने में। तभी यह विवाद किसी सीख में बदलेगा; अन्यथा यह केवल एक और अध्याय बनकर रह जाएगा—जहाँ सवाल दब गए और शोर जीत गया।






