उत्तर प्रदेश में कोडीन युक्त खांसी की दवाओं को लेकर उठा विवाद केवल एक राजनीतिक बयान नहीं है, बल्कि यह जनस्वास्थ्य व्यवस्था की गहरी खामियों को उजागर करता है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने जब यह कहा कि “यूपी वाली कोडीन सिरप मत लेना, बच्चों की जान तक जा चुकी है”, तो यह बयान सत्ता पर हमला भर नहीं था, बल्कि एक गंभीर चेतावनी भी थी।
दवा का मतलब इलाज होता है, भरोसा होता है। खासकर बच्चों के मामले में माता-पिता आंख बंद कर डॉक्टर और दवा प्रणाली पर विश्वास करते हैं। लेकिन यदि यही दवाएं बच्चों की जान के लिए खतरा बन जाएं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि व्यवस्था आखिर काम कैसे कर रही है?
कोडीन एक संवेदनशील तत्व है। विशेषज्ञ पहले से चेताते रहे हैं कि बच्चों में इसके सेवन से सांस रुकने, बेहोशी और मृत्यु तक का खतरा हो सकता है। कई देशों में बच्चों के लिए कोडीन पर सख्त प्रतिबंध हैं। ऐसे में यदि उत्तर प्रदेश में कोडीन युक्त सिरप खुले बाजार में बिक रही है और मौत तक के आरोप लग रहे हैं, तो यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि सिस्टम की विफलता है।
सबसे बड़ा सवाल ड्रग कंट्रोल और स्वास्थ्य विभाग की भूमिका पर खड़ा होता है।क्या दवाओं की नियमित जांच हो रही है?क्या शिकायतों को समय रहते गंभीरता से लिया गया?
यदि मौत के आरोप हैं, तो अब तक ठोस कार्रवाई क्यों नहीं दिखी?
यह मुद्दा राजनीति से ऊपर है। इसे सत्तापक्ष बनाम विपक्ष की बहस में बदलना बच्चों की सुरक्षा के साथ अन्याय होगा। अगर आरोप गलत हैं, तो सरकार को तथ्य सामने रखकर स्थिति साफ करनी चाहिए। और अगर आरोपों में सच्चाई है, तो दोषी दवा कंपनियों और जिम्मेदार अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।
यह भी जरूरी है कि बच्चों के लिए बनने वाली दवाओं पर अलग और ज्यादा सख्त नियम लागू हों। मेडिकल स्टोरों पर बिना पर्ची संवेदनशील दवाओं की बिक्री रोकना अब केवल सलाह नहीं, बल्कि अनिवार्यता बन चुकी है। साथ ही आम लोगों को भी जागरूक किया जाना चाहिए कि वे बच्चों को दवा देने में सावधानी बरतें।
अंततः सवाल यही है—
अगर बीमारी से बचाने वाली दवा ही जान लेने लगे, तो सबसे बड़ी जिम्मेदारी किसकी है?
सरकार की चुप्पी, विभागों की सुस्ती और कंपनियों की लापरवाही—तीनों मिलकर जनविश्वास को तोड़ती हैं। इस मामले में अब बयान नहीं, बल्कि स्पष्ट जांच, पारदर्शिता और सख्त कार्रवाई की जरूरत है। क्योंकि बच्चों की सेहत पर कोई भी समझौता, किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं हो सकता।

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