उत्तर प्रदेश पुलिस, जो देश की सबसे बड़ी पुलिस फोर्स मानी जाती है, आज केवल कानून-व्यवस्था ही नहीं बल्कि अपने आंतरिक प्रशासनिक संतुलन को लेकर भी गंभीर सवालों के घेरे में है। बीते वर्ष के अंत तक हुए रिटायरमेंट और प्रमोशन के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि पुलिस महकमे में रैंक और स्वीकृत पदों के बीच गहरा असंतुलन पैदा हो चुका है। यह असंतुलन सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी प्रभाव प्रशासनिक दक्षता, निर्णय प्रक्रिया और अफसरों के मनोबल पर भी पड़ सकते हैं।
प्रदेश में एडीजी रैंक के 21 कैडर पद स्वीकृत हैं, लेकिन वर्तमान में 36 अफसर इस रैंक में कार्यरत हैं। यह अंतर अपने आप में सिस्टम की विसंगति को उजागर करता है। स्थिति यह है कि कुछ एडीजी कैडर पदों पर डीजी स्तर के अफसर तैनात हैं, तो कहीं आईजी स्तर के अफसर एडीजी की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
इस तरह की अस्थायी और असंगत तैनातियां यह संकेत देती हैं कि प्रमोशन नीति और पोस्टिंग प्लानिंग के बीच तालमेल की कमी है। नतीजतन, वरिष्ठ रैंक के अफसरों को उनकी योग्यता और रैंक के अनुरूप स्पष्ट भूमिका नहीं मिल पा रही है।सबसे कमजोर कड़ी
अगर किसी एक रैंक को इस असंतुलन का सबसे बड़ा शिकार कहा जाए, तो वह आईजी रैंक है। प्रदेश में 51 आईजी कैडर पद स्वीकृत हैं, लेकिन उपलब्ध अफसरों की संख्या केवल 33 है। हालात यह हैं कि प्रदेश की 18 रेंजों में से अधिकांश में आईजी की जगह डीआईजी रैंक के अफसरों को जिम्मेदारी सौंपी गई है।
आईजी रेंज स्तर का अधिकारी होता है, जो कई जिलों की रणनीतिक निगरानी और समन्वय का कार्य करता है। ऐसे में इस स्तर पर रैंक से नीचे के अफसरों की तैनाती प्रशासनिक दबाव बढ़ाने के साथ-साथ निर्णय प्रक्रिया को भी प्रभावित करती है।
डीआईजी स्तर पर स्थिति ठीक इसके उलट है। 2012 बैच के प्रमोशन के बाद डीआईजी रैंक के अफसरों की संख्या बढ़कर 66 हो गई है, जबकि स्वीकृत पद केवल 51 हैं। यह अतिरिक्त संख्या अब विभाग के सामने नई चुनौती बनकर खड़ी है।
संभावना जताई जा रही है कि बड़े जिलों में एसएसपी के रूप में डीआईजी रैंक के अफसरों को तैनाती दी जाएगी या फिर आईजी कैडर की रेंजों में डीआईजी स्तर के अधिकारियों को जिम्मेदारी सौंपी जाएगी। हालांकि यह समाधान तात्कालिक हो सकता है, लेकिन इससे रैंक आधारित प्रशासनिक ढांचे की मूल अवधारणा कमजोर होती है।
पुलिस जैसी अनुशासित सेवा में रैंक संरचना केवल पदनाम नहीं होती, बल्कि वह अधिकार, जिम्मेदारी और जवाबदेही का स्पष्ट ढांचा तय करती है। जब एक ही रैंक के अफसर जरूरत से ज्यादा हों और दूसरी रैंक में भारी कमी हो, तो यह असंतुलन आदेश-पालन, समन्वय और नीति क्रियान्वयन को प्रभावित करता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि 2027 में होने वाले संभावित प्रमोशन के बाद यह स्थिति और जटिल हो सकती है, यदि अभी से कैडर रिव्यू और दीर्घकालिक योजना पर काम नहीं किया गया।
यूपी पुलिस में रैंक असंतुलन महज प्रशासनिक आंकड़ों की गड़बड़ी नहीं है, बल्कि यह भविष्य की कानून-व्यवस्था और आंतरिक प्रबंधन से जुड़ा गंभीर मुद्दा है। समय की मांग है कि सरकार और पुलिस मुख्यालय मिलकर प्रमोशन नीति, कैडर स्ट्रक्चर और पोस्टिंग व्यवस्था पर पुनर्विचार करें, ताकि हर रैंक के अफसर को उसकी भूमिका के अनुरूप जिम्मेदारी मिल सके।
यदि ऐसा नहीं हुआ, तो यह असंतुलन आने वाले वर्षों में न सिर्फ अफसरों के मनोबल को प्रभावित करेगा, बल्कि पूरे पुलिस प्रशासन की कार्यकुशलता पर भी सवाल खड़े करेगा।

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