अमेरिकी राजनीति एक बार फिर आक्रामक राष्ट्रवाद की भाषा बोलती दिख रही है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत, चीन और ब्राजील जैसे देशों पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की तैयारी की खबरें केवल व्यापार नीति का संकेत नहीं हैं, बल्कि वैश्विक कूटनीति में दबाव की नई परिभाषा गढ़ने की कोशिश भी हैं। रूस से तेल खरीदने वाले देशों को दंडित करने की मंशा के साथ पेश किया जाने वाला यह प्रस्ताव, दरअसल अमेरिका की उस सोच को उजागर करता है जिसमें उसकी विदेश नीति, ऊर्जा सुरक्षा और व्यापार—तीनों एक साथ साधे जा रहे हैं।
इस कदम के पीछे तर्क दिया जा रहा है कि रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाकर युद्ध की लागत बढ़ाई जाए। अमेरिकी सीनेट में इसे समर्थन देने की बात कर रहे लिंडसे ग्राहम जैसे सांसदों का कहना है कि जो देश रूसी ऊर्जा खरीदकर मॉस्को को राहत देते हैं, उन्हें कड़ा आर्थिक संदेश मिलना चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि क्या टैरिफ की ऐसी अतिशय दरें वास्तव में अंतरराष्ट्रीय कानून और मुक्त व्यापार के सिद्धांतों के अनुरूप हैं?
भारत के संदर्भ में यह बहस और भी जटिल हो जाती है। भारत ने हमेशा अपनी ऊर्जा नीति को राष्ट्रीय हित और ऊर्जा सुरक्षा के दायरे में तय किया है। वैश्विक अस्थिरता के बीच किफायती ऊर्जा तक पहुंच किसी भी उभरती अर्थव्यवस्था के लिए जीवनरेखा होती है। ऐसे में एकतरफा टैरिफ की धमकी न केवल आर्थिक दबाव बनाती है, बल्कि देशों की रणनीतिक स्वायत्तता पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है। क्या किसी संप्रभु देश को यह तय करने की स्वतंत्रता नहीं होनी चाहिए कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतें कैसे पूरी करे?
चीन और ब्राजील के लिए भी यह प्रस्ताव समान रूप से चुनौतीपूर्ण है। तीनों देशों का साझा प्रश्न यह है कि क्या वैश्विक राजनीति में आर्थिक हथियारों का इस तरह इस्तेमाल आगे चलकर आपूर्ति श्रृंखलाओं को और अस्थिर नहीं करेगा? 500 प्रतिशत टैरिफ जैसी बातें बाजारों में अनिश्चितता बढ़ाती हैं, निवेशकों के भरोसे को झकझोरती हैं और अंततः वैश्विक महंगाई को हवा देती हैं—जिसका बोझ आम उपभोक्ता पर पड़ता है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि अमेरिका के भीतर भी ऐसे कदमों पर मतभेद रहे हैं। कठोर टैरिफ अक्सर घरेलू उद्योगों को अल्पकालिक सुरक्षा तो देते हैं, लेकिन दीर्घकाल में प्रतिशोधात्मक शुल्क, व्यापार युद्ध और राजनयिक तनाव को जन्म देते हैं। इतिहास गवाह है कि व्यापार युद्धों में विजेता कम और नुकसान उठाने वाले अधिक होते हैं।
भारत के लिए यह क्षण संतुलन साधने का है—एक ओर रणनीतिक साझेदारियों को संभालना, दूसरी ओर अपने आर्थिक हितों की रक्षा करना। संवाद, बहुपक्षीय मंचों पर सक्रिय कूटनीति और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर जोर ही इस संकट का टिकाऊ समाधान हो सकता है।
अंततः सवाल यह नहीं कि टैरिफ कितने प्रतिशत होंगे, बल्कि यह है कि क्या दबाव की राजनीति वैश्विक शांति और स्थिरता का रास्ता बन सकती है? जवाब शायद वही है जो इतिहास बार-बार देता आया है—स्थायी समाधान धमकियों से नहीं, संवाद और सहयोग से निकलते हैं।






