जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) एक बार फिर देश की राजनीति और बहस के केंद्र में है। कारण वही पुराना है—विरोध, नारे और उनकी व्याख्या। इस बार पृष्ठभूमि बनी है 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े मामलों में उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत न मिलना और उसी के विरोध में आधी रात को हुआ प्रदर्शन। सवाल केवल एक परिसर या कुछ नारों का नहीं है, बल्कि यह उस संतुलन का है, जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक जिम्मेदारी आमने-सामने खड़ी दिखती हैं।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा जमानत याचिकाएं खारिज किए जाने के बाद जेएनयू में छात्र संगठन के बैनर तले विरोध हुआ। यह विरोध ऐसे समय में हुआ, जब 5 जनवरी 2020 की हिंसा की बरसी भी थी—एक ऐसी घटना, जिसने विश्वविद्यालय की छवि और देश की अकादमिक राजनीति को गहरे रूप से प्रभावित किया। ऐसे संवेदनशील अवसर पर उठे नारे, चाहे वे वैचारिक कहे जाएं या प्रतीकात्मक, स्वाभाविक रूप से राष्ट्रीय बहस को जन्म देते हैं।
विवाद की जड़ उन कथित नारों में है, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ बताए जा रहे हैं। वीडियो सामने आने के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं तेज होना अस्वाभाविक नहीं है। सत्ता पक्ष इसे न्यायपालिका और राष्ट्र के खिलाफ उकसावे के रूप में देख रहा है, जबकि छात्र संगठन इसे वैचारिक असहमति और लोकतांत्रिक विरोध बता रहे हैं।
यहां मूल प्रश्न यह है कि क्या हर विरोध स्वतः लोकतांत्रिक हो जाता है? या फिर विरोध की भी एक मर्यादा होती है? भारत का लोकतंत्र असहमति की रक्षा करता है, लेकिन साथ ही संस्थाओं—विशेषकर न्यायपालिका—के प्रति सम्मान की अपेक्षा भी करता है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला चाहे किसी को स्वीकार्य हो या नहीं, उस पर प्रतिक्रिया का तरीका ही लोकतांत्रिक संस्कृति की असली परीक्षा है।
जेएनयू छात्र संघ की अध्यक्ष अदिति मिश्रा का यह कहना कि नारे वैचारिक थे और व्यक्तिगत नहीं, अपने आप में एक तर्क है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि सार्वजनिक जीवन में प्रयुक्त शब्दों का असर दीवारों तक सीमित नहीं रहता। जेएनयू जैसे संस्थान से निकली हर आवाज़ पूरे देश में गूंजती है—और उसी अनुपात में उसकी जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है।
राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं इस पूरे घटनाक्रम को और जटिल बना देती हैं। एक पक्ष इसे “देश विरोधी” बताता है, दूसरा “दमन के खिलाफ आवाज़”। लेकिन इस शोर में वह मूल मुद्दा कहीं दब जाता है—क्या विश्वविद्यालय विचार-मंथन का मंच रहेगा या स्थायी राजनीतिक टकराव का अखाड़ा?
यह भी नहीं भूलना चाहिए कि 5 जनवरी 2020 की हिंसा आज तक पूरी तरह न्यायिक निष्कर्ष तक नहीं पहुंच पाई है। उस दिन छात्रों पर हमला हुआ था, लोकतांत्रिक मूल्यों पर चोट पड़ी थी। उसी स्मृति के साथ जुड़ा यह नया विवाद बताता है कि जेएनयू अभी भी अपने अतीत से पूरी तरह बाहर नहीं आ पाया है।
विरोध लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन भाषा और प्रतीक उसकी नैतिक रीढ़। अगर विरोध की शैली ही लोकतांत्रिक मूल्यों को चुनौती देने लगे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। जेएनयू को भी और देश को भी ऐसे संवाद की जरूरत है, जो असहमति को तीखा तो बनाए, लेकिन उसे विभाजनकारी न होने दे। क्योंकि अंततः विश्वविद्यालय केवल विरोध के नहीं, भविष्य के निर्माण के केंद्र होते हैं।





