भारतीय राजनीति आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ से आगे का रास्ता या तो लोकतंत्र को और मजबूत करेगा या फिर उसे केवल चुनावी औपचारिकता तक सीमित कर देगा। आज राजनीति में गतिविधियाँ तेज़ हैं, सत्ता स्थिर दिखती है, लेकिन जनता के मन में असंतोष और सवाल लगातार गहराते जा रहे हैं। यह विरोधाभास ही वर्तमान राजनीति की सबसे बड़ी सच्चाई है।
स्वतंत्रता के बाद राजनीति का उद्देश्य स्पष्ट था—देश निर्माण, सामाजिक न्याय और समावेशी विकास। लेकिन समय के साथ राजनीति का चरित्र बदला। अब यह विचारों और नीतियों की नहीं, बल्कि प्रबंधन, प्रचार और ध्रुवीकरण की प्रतियोगिता बनती जा रही है। चुनाव अब केवल जनमत का उत्सव नहीं, बल्कि संसाधनों, सोशल मीडिया रणनीति और भावनात्मक मुद्दों की लड़ाई बन चुके हैं।
मुद्दों से हटती राजनीति
आज देश जिन वास्तविक समस्याओं से जूझ रहा है—बेरोज़गारी, महंगाई, शिक्षा का गिरता स्तर, स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली—वे राजनीतिक विमर्श के केंद्र में नहीं हैं। संसद से लेकर विधानसभा और चुनावी मंचों तक इन सवालों पर चर्चा सीमित होती जा रही है। इसके बजाय पहचान की राजनीति, भावनात्मक नारे और तात्कालिक लाभ देने वाले मुद्दे हावी हैं।
इसका सबसे बड़ा नुकसान यह है कि नीति निर्माण दीर्घकालिक न होकर तात्कालिक हो गया है। सरकारें चुनावी चक्र को ध्यान में रखकर फैसले ले रही हैं, न कि भविष्य की ज़रूरतों को देखकर। इससे विकास की दिशा तो दिखती है, लेकिन उसकी नींव कमजोर होती जाती है।
विपक्ष और लोकतांत्रिक संतुलन
लोकतंत्र की मजबूती सत्ता और विपक्ष के संतुलन पर टिकी होती है। लेकिन वर्तमान राजनीति में विपक्ष या तो बिखरा हुआ है या प्रभावहीन। कई बार वह सरकार से सवाल उठाने में विफल रहता है, तो कई बार केवल शोरगुल तक सीमित रह जाता है। इससे सरकार की जवाबदेही कमजोर होती है और लोकतांत्रिक निगरानी का तंत्र प्रभावित होता है।
मजबूत विपक्ष का मतलब सरकार को अस्थिर करना नहीं, बल्कि उसे बेहतर निर्णय लेने के लिए मजबूर करना होता है। जब यह भूमिका कमजोर पड़ती है, तब सत्ता निरंकुश प्रवृत्तियों की ओर बढ़ सकती है—चाहे वह किसी भी दल की हो।
धन, बाहुबल और राजनीति का संकट
आज राजनीति में प्रवेश आम नागरिक के लिए कठिन होता जा रहा है। चुनाव लड़ने की लागत इतनी अधिक हो चुकी है कि ईमानदार और साधारण पृष्ठभूमि के लोग पीछे छूट जाते हैं। धन और प्रभाव रखने वाले लोग राजनीति में आगे बढ़ते हैं, जिससे जनप्रतिनिधित्व का मूल विचार कमजोर होता है।
जब राजनीति आम आदमी की पहुंच से बाहर होती है, तब लोकतंत्र की आत्मा को चोट पहुंचती है। जनप्रतिनिधि जनता के बजाय संसाधनों और ताकतवर वर्गों के प्रति जवाबदेह होने लगते हैं।
सोशल मीडिया और नई राजनीति
सोशल मीडिया ने राजनीति को तेज़, व्यापक और प्रभावशाली बनाया है। यह जनता को सीधा जुड़ाव देता है, लेकिन इसके साथ ही अफवाह, नफरत और अधूरी सच्चाई का खतरा भी बढ़ा है। आज राजनीति में सत्य से अधिक प्रभाव और भावनात्मक अपील को महत्व दिया जा रहा है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बनने वाली राय कई बार ज़मीनी हकीकत से कट जाती है। इससे राजनीति वास्तविक समस्याओं के समाधान से भटककर छवि निर्माण तक सीमित हो जाती है।
युवा और राजनीति का रिश्ता
देश का युवा आज राजनीति को ध्यान से देख रहा है, लेकिन उसमें भागीदारी से दूरी बनाए हुए है। उसे लगता है कि राजनीति में न ईमानदारी है, न भविष्य। यह स्थिति बेहद चिंताजनक है, क्योंकि युवा किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति होता है।
अगर युवा केवल आलोचक बनकर रह गया और सक्रिय भागीदारी से दूर रहा, तो राजनीति और समाज के बीच की खाई और गहरी होगी।
आज राजनीति को आत्ममंथन की ज़रूरत है। सत्ता में बैठे लोगों को समझना होगा कि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं, बल्कि भरोसा निभाने की प्रक्रिया है। जनता को सिर्फ वोटर नहीं, सहभागी बनाना होगा।
जवाबदेही, पारदर्शिता, मजबूत संस्थाएं और मुद्दा आधारित राजनीति ही लोकतंत्र को बचा सकती है। वरना राजनीति भले चलती रहे, लेकिन लोकतंत्र खोखला होता चला जाएगा।
लोकतंत्र सवाल पूछने से मजबूत होता है, और राजनीति उन सवालों से भागकर कमजोर।






