पौष पूर्णिमा के पावन अवसर पर प्रयागराज का त्रिवेणी संगम एक बार फिर यह साबित करता दिखा कि भारत की आत्मा आज भी आस्था, परंपरा और विश्वास से संचालित होती है। तड़के भोर से लेकर दिन चढ़ने तक संगम तट पर उमड़ा जनसैलाब केवल संख्या नहीं था, वह उस सांस्कृतिक चेतना का जीवंत प्रमाण था, जो सदियों से गंगा-यमुना-सरस्वती के संगम पर प्रवाहित होती आ रही है।
लाखों श्रद्धालुओं का एक साथ संगम में उतरना, ‘हर-हर गंगे’ और ‘जय मां गंगा’ के जयघोष, और स्नान के बाद आरती व दान—यह सब मिलकर माघ मेले की उस आत्मा को प्रकट करता है, जो आधुनिक समय में भी उतनी ही सशक्त है, जितनी प्राचीन काल में थी। पौष पूर्णिमा का यह पहला स्नान पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने वाला एक सामूहिक अनुभव है।
माघ मेला का शुभारंभ हर बार प्रशासन के लिए भी एक बड़ी परीक्षा लेकर आता है। इस बार भारी भीड़ को देखते हुए सुरक्षा के जो इंतजाम किए गए, वे यह दर्शाते हैं कि राज्य अब धार्मिक आयोजनों को केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि सुनियोजित प्रबंधन की जिम्मेदारी मानकर चल रहा है। अस्थायी थानों, पुलिस चौकियों, ड्रोन और सीसीटीवी की निगरानी यह संकेत देती है कि व्यवस्था अब पहले से अधिक सतर्क और तकनीक-संपन्न हुई है।
हालांकि, इतनी व्यापक सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद कुछ कथित बाबाओं का नकली नोटों के साथ पकड़ा जाना एक कड़वा सच भी उजागर करता है। यह घटना याद दिलाती है कि जहां आस्था का सैलाब होता है, वहां उसे भुनाने वाले तत्व भी सक्रिय हो जाते हैं। ऐसे मामलों में सख्ती यह संदेश देती है कि धर्म की आड़ में अपराध को किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जाएगा।
पौष पूर्णिमा के साथ ही कल्पवासियों का संगम क्षेत्र में डेरा डालना माघ मेले को उसका वास्तविक स्वरूप देता है। साधु-संतों, अखाड़ों और तपस्वियों की मौजूदगी इस आयोजन को केवल भीड़ नहीं, बल्कि साधना का पर्व बनाती है। कल्पवास भारतीय जीवन-दर्शन का वह पक्ष है, जहां त्याग, अनुशासन और आत्मचिंतन प्रमुख हैं—और यही माघ मेले को विशिष्ट बनाता है।
प्रमुख स्नान पर्व पर नाव संचालन बंद होना सुरक्षा की दृष्टि से भले ही आवश्यक हो, लेकिन इससे प्रभावित नाविकों का आक्रोश भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। यह स्थिति बताती है कि प्रशासन को आस्था और आजीविका—दोनों के बीच संतुलन साधना होगा। समयबद्ध पंजीकरण और स्पष्ट संवाद से ऐसे टकरावों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
माघ मेले का प्रभाव केवल प्रयागराज तक सीमित नहीं रहा। गंगा के अन्य तटों पर भी पौष पूर्णिमा की आस्था समान रूप से दिखाई दी। फर्रुखाबाद में हजारों श्रद्धालुओं का गंगा स्नान यह बताता है कि यह पर्व एक शहर या एक मेले तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे गंगा-तटवर्ती समाज की सामूहिक आस्था का प्रतीक है।
पौष पूर्णिमा का स्नान पर्व यह संदेश देता है कि आधुनिकता की तेज रफ्तार के बीच भी भारतीय समाज अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है। माघ मेला 2026 की शुरुआत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आस्था, व्यवस्था और सुरक्षा—तीनों का संतुलन ही ऐसे आयोजनों की सफलता की कुंजी है। यदि यह संतुलन बना रहा, तो माघ मेला न केवल धार्मिक, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी एक आदर्श आयोजन के रूप में स्थापित होता रहेगा।

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