इंदौर के भागीरथपुरा की घटना किसी एक मोहल्ले की त्रासदी नहीं है, यह पूरे शासन-प्रशासन की संवेदनहीनता और जवाबदेहीहीन व्यवस्था का आईना है। दूषित पानी पीने से 13 से अधिक लोगों की मौत और दर्जनों का अस्पतालों में भर्ती होना एक ऐसी चेतावनी है, जिसे अब भी अनसुना किया गया तो इसके नतीजे और भयावह होंगे।
सबसे डरावनी बात यह नहीं है कि लोग मरे, बल्कि यह है कि लोगों को पहले से पता था कि वे जहर पी रहे हैं। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि डेढ़ से दो साल से नाली और पेयजल की लाइनें आपस में जुड़ी हुई थीं। शिकायतें हुईं, अफसरों को बताया गया, जनप्रतिनिधियों तक बात पहुंची—लेकिन सिस्टम ने आंखें मूंदे रखीं। यह लापरवाही नहीं, बल्कि संस्थागत अपराध है।
इंदौर को देश की “स्मार्ट सिटी” का तमगा मिला है। स्वच्छता रैंकिंग में यह शहर बार-बार नंबर वन बताया जाता है। लेकिन भागीरथपुरा ने साबित कर दिया कि रैंकिंग और हकीकत के बीच गहरी खाई है। कूड़ा साफ दिख सकता है, सड़कें चमक सकती हैं, लेकिन अगर पीने के पानी में सीवर मिल रहा है तो यह विकास नहीं, बल्कि दिखावा है।
इस पूरे प्रकरण में प्रशासन की भूमिका सबसे ज्यादा कठघरे में है। सवाल सीधा है—
अगर समस्या सालों से थी, तो उसे ठीक क्यों नहीं किया गया?
शिकायतों के बाद भी पाइपलाइन बदली क्यों नहीं गई?
क्या नगर निगम और स्वास्थ्य विभाग की कोई जवाबदेही नहीं बनती?
मौतों के बाद भी यदि नगर आयुक्त और जिम्मेदार अधिकारियों पर ठोस कार्रवाई नहीं होती, तो यह साफ संदेश जाता है कि व्यवस्था आम आदमी की जान को गंभीरता से नहीं लेती। जांच कमेटियां और मुआवजे की घोषणाएं अब लोगों को खोखली लगने लगी हैं, क्योंकि ये हर हादसे के बाद की जाने वाली रस्म बन चुकी हैं।
यह मामला अब सीधे प्रदेश की राजनीति से जुड़ गया है। मुख्यमंत्री मोहन यादव के सामने यह सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि नैतिक चुनौती भी है। जनता जानना चाहती है कि इतने बड़े जनहानि कांड के बाद भी सरकार निर्णायक एक्शन लेने में हिचक क्यों रही है? क्या दोषियों तक हाथ पहुंचने से पहले सत्ता के समीकरण आड़े आ जाते हैं?
इंदौर की राजनीति में कैलाश विजयवर्गीय का प्रभाव जगजाहिर है। ऐसे में यह चर्चा आम हो चुकी है कि कहीं राजनीतिक संतुलन साधने के दबाव में कार्रवाई को कमजोर तो नहीं किया जा रहा। यदि यह सच है, तो यह केवल सरकार ही नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की भी हार है।
भागीरथपुरा की त्रासदी एक बड़ा सवाल छोड़ती है—क्या आम नागरिक की जान की कीमत सत्ता के समीकरणों से कम है? यदि आज भी दोषियों को बचाया गया, तो यह संदेश जाएगा कि व्यवस्था तब तक नहीं जागती, जब तक मौतें सुर्खियों में न आ जाएं।
अब जरूरत है प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि निर्णायक और उदाहरण बनने वाली कार्रवाई की। दोषी अफसरों का निलंबन, आपराधिक मुकदमे, पूरे शहर में जलापूर्ति व्यवस्था की स्वतंत्र जांच और भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों, इसके लिए ठोस रोडमैप—यही सच्ची संवेदना होगी।
भागीरथपुरा की गलियों में आज डर और गुस्सा है। सरकार के पास मौका है कि वह इस गुस्से को न्याय में बदले। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो यह हादसा सिर्फ 13 मौतों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह भरोसे की उस मौत में बदल जाएगा, जिसे दोबारा जिंदा करना सबसे मुश्किल होता हैl





