उत्तर प्रदेश की राजनीति एक बार फिर जातीय बैठकों और सामाजिक संदेशों के दौर में प्रवेश कर चुकी है। हाल के दिनों में ठाकुर और ब्राह्मण समाज की अलग-अलग बैठकों ने राजनीतिक गलियारों से लेकर आम चर्चा तक हलचल पैदा कर दी है। सवाल यह नहीं है कि बैठक हो रही है—सवाल यह है कि क्यों हो रही है, किसके इशारे पर हो रही है और इसका उद्देश्य क्या है।
प्रदेश की राजनीति में जाति कोई नई बात नहीं है। आज़ादी के बाद से अब तक सत्ता की चाभी कई बार जातीय संतुलन के इर्द-गिर्द ही घूमती रही है। लेकिन मौजूदा समय में ठाकुर और ब्राह्मण समाज की बैठकों का अचानक तेज़ होना यह संकेत देता है कि राजनीति फिर से सामाजिक ध्रुवीकरण की राह पकड़ रही है।
ठाकुर समाज की बैठकों में जहां “सम्मान”, “प्रशासन में हिस्सेदारी” और “सुरक्षा” जैसे मुद्दे उभर रहे हैं, वहीं ब्राह्मण समाज की बैठकों में “उपेक्षा”, “भागीदारी” और “नीतिगत निर्णयों में दखल” जैसे सवाल उठ रहे हैं। दोनों ही समाज खुद को सत्ता का स्वाभाविक भागीदार मानते हैं, लेकिन दोनों के भीतर यह भावना भी गहराती दिख रही है कि उनका उपयोग तो हुआ, पर उनका मूल्यांकन नहीं।
राजनीतिक दल इन बैठकों को भले ही सामाजिक संवाद का नाम दें, लेकिन हकीकत यह है कि हर बैठक के पीछे चुनावी गणित छिपा है। जातीय मंचों से निकलने वाले बयान, प्रस्ताव और मांगें सीधे तौर पर सत्ता को संदेश देने का काम कर रही हैं—“हमें नज़रअंदाज़ मत करो।”
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून व्यवस्था जैसे मूल मुद्दे पीछे छूटते जा रहे हैं। समाज को यह बताया जा रहा है कि उसकी पहचान उसकी जाति से है, न कि उसकी योग्यता, अधिकार या नागरिकता से।
राजनीति यदि समाज को जोड़ने के बजाय जातियों में बांटने का माध्यम बन जाए, तो इसका दीर्घकालिक असर बेहद खतरनाक होता है। ठाकुर और ब्राह्मण दोनों ही समाज प्रदेश के सामाजिक ताने-बाने का अहम हिस्सा हैं, लेकिन जब इन्हें आमने-सामने खड़ा करने या अलग-अलग संदेश देने की कोशिश होती है, तो यह सामाजिक समरसता को कमजोर करता है।
जरूरत इस बात की है कि राजनीतिक दल जातीय बैठकों से आगे बढ़कर समावेशी संवाद करें। समाज की चिंता केवल सत्ता में हिस्सेदारी नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन, सुरक्षा और अवसरों की समानता है। यदि राजनीति इन वास्तविक मुद्दों को नजरअंदाज कर सिर्फ जातीय संतुलन साधने में लगी रही, तो इसका नुकसान अंततः लोकतंत्र को ही होगा।
प्रदेश की जनता अब केवल जाति की बात सुनना नहीं चाहती, वह काम, परिणाम और जवाबदेही चाहती है। ठाकुर–ब्राह्मण बैठकों का संदेश यदि सत्ता को यह याद दिला रहा है कि समाज जागरूक है, तो यह सकारात्मक है। लेकिन अगर यह केवल वोट बैंक की नई बिसात बनकर रह गई, तो इतिहास गवाह है—ऐसी राजनीति ज्यादा दूर तक नहीं चलती।
समय की मांग है कि राजनीति जाति से ऊपर उठे,
और सत्ता समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चले—
वरना बैठकें तो होंगी, लेकिन भरोसा टूटता चला जाएगा।

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