उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव से पहले जारी की गई नई मतदाता सूची ने एक बार फिर चुनावी व्यवस्था और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की मजबूती पर बहस छेड़ दी है। विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान के बाद सामने आए आंकड़े जहां एक ओर प्रशासनिक सक्रियता को दर्शाते हैं, वहीं दूसरी ओर कई गंभीर सवाल भी खड़े करते हैं।
राज्य में 1.81 करोड़ नए मतदाताओं का जुड़ना और 1.41 करोड़ नामों का हटना कोई मामूली बदलाव नहीं है। इसके साथ ही 53.67 लाख डुप्लीकेट मतदाताओं के नाम काटे जाना यह साबित करता है कि वर्षों से मतदाता सूची में अव्यवस्थाएं बनी हुई थीं। यदि यह सूची पहले ही दुरुस्त होती, तो इतने बड़े पैमाने पर संशोधन की जरूरत ही नहीं पड़ती।
इस पूरी प्रक्रिया का सकारात्मक पक्ष यह है कि 1 करोड़ 5 लाख युवा पहली बार मतदाता बने हैं। यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है। गांवों और पंचायत स्तर पर युवाओं की भागीदारी न केवल मतदान प्रतिशत बढ़ाएगी, बल्कि स्थानीय राजनीति को भी नई सोच और ऊर्जा देगी। सवाल यह है कि क्या इन युवाओं को केवल मतदाता तक सीमित रखा जाएगा या उन्हें निर्णय प्रक्रिया में भी वास्तविक भागीदारी दी जाएगी?
53 लाख से अधिक डुप्लीकेट नामों का मिलना यह भी दर्शाता है कि बीते वर्षों में मतदाता सूची का रखरखाव कितनी लापरवाही से किया गया। मृत व्यक्तियों, स्थानांतरित मतदाताओं और दोहरे नामों का बने रहना चुनावी पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है। अब जब सूची को शुद्ध किया गया है, तो यह जिम्मेदारी तय होनी चाहिए कि यह गड़बड़ी आखिर बनी कैसे।
मतदाता सूची पर 30 दिसंबर तक आपत्तियां दर्ज कराने का अवसर देना एक आवश्यक लोकतांत्रिक कदम है। लेकिन अनुभव बताता है कि ग्रामीण इलाकों में बहुत से मतदाता या तो जानकारी के अभाव में या डर के कारण आपत्ति दर्ज नहीं करा पाते। ऐसे में प्रशासन और चुनाव आयोग की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि वह इस प्रक्रिया को केवल औपचारिकता न बनने दे।
अंतिम सूची और निष्पक्ष चुनाव
6 फरवरी को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होना पंचायत चुनाव की दिशा तय करेगा। यही सूची ग्राम प्रधान से लेकर जिला पंचायत सदस्य तक के चुनावों का आधार बनेगी। यदि इस सूची में भी कोई बड़ी चूक रह जाती है, तो निष्पक्ष चुनाव का दावा कमजोर पड़ जाएगा।
मतदाता सूची का शुद्धिकरण लोकतंत्र की रीढ़ को मजबूत करने की प्रक्रिया है, लेकिन यह तभी सार्थक होगी जब पारदर्शिता, जवाबदेही और जनभागीदारी तीनों साथ चलें। पंचायत चुनाव गांव की सत्ता तय करते हैं और गांव ही लोकतंत्र की पहली सीढ़ी हैं। ऐसे में मतदाता सूची को लेकर की गई हर कार्रवाई केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि जनता के विश्वास को भी मजबूत करनी चाहिए।अब यह जिम्मेदारी राज्य निर्वाचन आयोग उत्तर प्रदेश और प्रशासन दोनों की है कि वे अंतिम सूची तक पहुंचते-पहुंचते हर योग्य मतदाता को उसका अधिकार दिलाएं और किसी भी तरह की चुनावी शंका को खत्म करें।
क्योंकि मजबूत पंचायत ही मजबूत लोकतंत्र की नींव होती है।

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