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Tuesday, February 10, 2026

वंदे मातरम् पर बहस: राष्ट्रभक्ति का प्रतीक या राजनीति का औज़ार?

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भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में जब भी वंदे मातरम् का नाम आता है, भावनाओं का ज्वार उमड़ पड़ता है। यह वही गीत है, जिसने गुलामी के दौर में देशवासियों की रगों में आज़ादी की आग भरी, जेलों और फांसी के फंदों के बीच संघर्ष को ताक़त दी। इसके बावजूद आज़ाद भारत में बार-बार यह सवाल उठना कि वंदे मातरम् पर बहस कितनी उचित है—दरअसल हमारे लोकतांत्रिक विवेक और राजनीतिक प्राथमिकताओं की परीक्षा है।

वंदे मातरम्: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित वंदे मातरम् 19वीं सदी के अंत में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का घोषवाक्य बन गया। लाला लाजपत राय, बिपिन चंद्र पाल, अरविंद घोष, सुभाष चंद्र बोस जैसे नेताओं ने इसे आंदोलन की आत्मा माना।

1950 में संविधान सभा ने इसे राष्ट्रीय गीत का सम्मान दिया, जबकि जन गण मन को राष्ट्रगान का दर्जा मिला। यह निर्णय स्वयं इस बात का प्रमाण है कि भारत ने शुरू से ही सम्मान और स्वतंत्रता के संतुलन को प्राथमिकता दी।

संविधान क्या कहता है?

भारतीय संविधान किसी भी नागरिक को वंदे मातरम् गाने या बोलने के लिए बाध्य नहीं करता। सुप्रीम कोर्ट भी कई फैसलों में स्पष्ट कर चुका है कि

देशभक्ति को किसी विशेष नारे, गीत या प्रतीक से नहीं मापा जा सकता।

यानी राष्ट्र के प्रति निष्ठा भाव और आचरण से तय होती है, न कि जबरन उच्चारण से।

बहस कहाँ तक जायज़ है?

लोकतंत्र में विमर्श का अधिकार सबको है।

साहित्यिक दृष्टि से गीत की व्याख्या

ऐतिहासिक संदर्भों पर चर्चा

शैक्षणिक और सांस्कृतिक मंचों पर संवाद

ये सभी बहसें स्वस्थ और आवश्यक हैं। यदि किसी समुदाय या व्यक्ति को किसी पंक्ति से वैचारिक असहमति है, तो उसका समाधान संवाद, संवेदनशीलता और सह-अस्तित्व से निकलता है, न कि ज़बरदस्ती से।

बहस कब भटकाव बन जाती है?

समस्या तब पैदा होती है जब वंदे मातरम् को

देशभक्ति की परीक्षा बना दिया जाता है,राजनीतिक ध्रुवीकरण का औज़ार बनाया जाता है।

असली मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए उछाला जाता है

आज देश जिन वास्तविक समस्याओं से जूझ रहा है—

बेरोज़गारी, महँगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य की बदहाली, किसानों की आय, प्रशासनिक भ्रष्टाचार—उन पर गंभीर चर्चा के बजाय यदि सदन और सड़कों पर केवल प्रतीकों की लड़ाई लड़ी जाए, तो यह राष्ट्रहित नहीं, बल्कि राजनीतिक सुविधा कहलाएगी।

देशभक्ति का प्रमाण नारे से नहीं, कर्तव्य से मिलता है।

क्या हम कर ईमानदारी से देते हैं?

क्या हम सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करते हैं?क्या हम संविधान, कानून और लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करते हैं?क्या हम कमजोर और वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए खड़े होते हैं?

यदि उत्तर ‘हाँ’ है, तो वही सच्चा वंदे मातरम् है।

इतिहास गवाह है कि बाध्यता से पैदा हुआ सम्मान टिकाऊ नहीं होता।

जबरन नारे लगवाना, जबरन गीत गवाना या विरोध करने वालों को देशद्रोही ठहराना—यह सब लोकतंत्र को मजबूत नहीं, कमजोर करता है। इससे समाज में अविश्वास, भय और विभाजन बढ़ता है, जो किसी भी राष्ट्र के लिए घातक है।

वंदे मातरम् भारत की आत्मा का स्वर है—इसमें कोई संदेह नहीं।

लेकिन इस पर बहस तभी तक उचित है, जब तक वह

समझ बढ़ाए

संवैधानिक मूल्यों का सम्मान करे,

सामाजिक सौहार्द को मज़बूत करे,

जब यह बहस राजनीति की सुविधा, ज़बरदस्ती और ध्रुवीकरण का माध्यम बन जाए, तब यह राष्ट्रहित नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक पतन का संकेत बन जाती है।

भारत की ताक़त उसकी बहुलता, सहिष्णुता और विवेक में है।

वंदे मातरम् की सच्ची भावना भी यही है,देश से प्रेम, लेकिन एक-दूसरे की स्वतंत्रता के सम्मान के साथ।

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