“सनातन क्रिकेट लीग : खेल के बहाने संस्कृति पर चोट?”

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– बदलते भारतीय समाज, बदलती आस्थाएँ और खेल के नाम पर उभरती नई सांस्कृतिक बहस

भारतीय समाज में क्रिकेट सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि उत्सव, भावना और सामूहिक रोमांच का नाम है। इसी पृष्ठभूमि में आयोजित “सनातन क्रिकेट लीग” ने जहां खेल के प्रति उत्साह बढ़ाया है, वहीं एक नई बहस भी जन्म दे दी है—क्या धार्मिक परंपराओं के नाम पर होने वाले ये आयोजन भारतीय संस्कृति को मज़बूत कर रहे हैं, या इसके स्वरूप को बदलने की कोशिश कर रहे हैं?
भारत में सनातन संस्कृति का अर्थ है धर्म, दर्शन, सादगी, संयम और समाजहित। जब इन मूल्यों को किसी आयोजन से जोड़ा जाता है तो अपेक्षा होती है कि वह संस्कार, मर्यादा और सामाजिक सामंजस्य को बढ़ाएगा।
लेकिन सनातन क्रिकेट लीग में: टीमों के नाम धार्मिक आस्थाओं पर आधारित, उद्घाटन और समापन में धार्मिक प्रतीकों का प्रदर्शन, खिलाड़ियों से सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व की अपेक्षा, इन सबने खेल और संस्कृति के बीच एक नई रेखा खींच दी है।
यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या यह आस्था का सम्मान है, या धर्म के नाम पर खेल का व्यावसायीकरण?
क्रिकेट का सांस्कृतिक प्रभाव पहले ही बहुत गहरा है| भारत में क्रिकेट का प्रभाव इतना व्यापक है कि लोग अनेक त्योहारों की तरह मैचों को भी उत्सव मानते हैं। लेकिन जब इसे “सनातन” जैसे पवित्र शब्द से जोड़ा जाता है, तो यह केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सांस्कृतिक दायित्व का रूप लेने लगता है।
ऐसे में गलती, विवाद या अभद्रता सीधे धर्म के नाम से जोड़ी जाने लगती है, जो आस्था पर सीधा प्रभाव डालती है।
क्या इससे सनातन संस्कृति का विस्तार होगा या गलत संदेश जाएगा?
इसके दो पहलू हैंसकारात्मक दृष्टिकोण मे युवाओं में सनातन संस्कृति के प्रति रुचि बढ़ सकती है।
खेल के माध्यम से सांस्कृतिक जुड़ाव पैदा हो सकता है।
आयोजन पारंपरिक आयोजनों से हटकर आधुनिक मंच प्रदान करता है।
नकारात्मक पक्ष देखें तो धार्मिक प्रतीकों का अत्यधिक उपयोग सामाजिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण को बढ़ा सकता है।
खेल की हार-जीत को धर्म से जोड़ने का गलत संदेश जाता है।
पवित्र सांस्कृतिक शब्दों का व्यावसायिक ब्रांड की तरह उपयोग होने से संस्कृति की गरिमा कम होती है।
भविष्य में अन्य धर्म भी अपने-अपने खेल आयोजन शुरू करें तो समाज में सांस्कृतिक स्पर्धा बढ़ सकती है।
सनातन संस्कृति का मूल आधार वसुधैव कुटुंबकम्—सार्वभौमिकता—है।
जब किसी खेल को धर्म के विशेष दायरे में बाँध दिया जाता है, तो यह व्यापकता सिकुड़ने लगती है।
यह धीरे-धीरे समाज में अलगाव और पहचान आधारित खेल संस्कृति को जन्म दे सकता है, जो भारतीय परंपरा के विरुद्ध है।
युवा पीढ़ी संदेशों को शब्दों से नहीं, व्यवहार और परिवेश से सीखती है।
जब क्रिकेट जैसे रोमांचक खेल के साथ धार्मिक पहचान जोड़ दी जाती है, तो उनके मन में यह धारणा बन सकती है।
यह विचार धीरे-धीरे आस्था की गंभीरता को कमजोर कर सकता है।
सवाल यही है,क्या सनातन क्रिकेट लीग सनातन संस्कृति को मजबूत कर रही है, या उसे सतही बना रही है?
असली चुनौती यही है। संस्कृति का विस्तार तभी होता है जब उसका सम्मान और गरिमा बनी रहे।
अगर धार्मिक नाम और प्रतीक केवल दर्शक जुटाने का साधन बन जाएँ, तो यह संस्कृति नहीं, सांस्कृतिक उपभोगवाद कहलाता है।
सनातन क्रिकेट लीग एक नई पहल है, इसमें प्रतिभा भी है, उत्साह भी।
परंतु भारतीय संस्कृति का दायरा बहुत व्यापक, पवित्र और संतुलित है।धर्म और खेल को मिलाना गलत नहीं, लेकिन इसे संस्कृति की मर्यादा और संवेदनशीलता के साथ करना आवश्यक है।
अगर यह संतुलन बिगड़ा, तो लीग लोकप्रिय तो होगी, पर सनातन संस्कृति अपनी गहराई खो देगी।

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