फर्रुखाबाद के एस.के.एम. इंटर कॉलेज और कृष्णा पब्लिक स्कूल की मान्यता का मामला अब पूरी तरह साफ है। 2020 में जिलाधिकारी द्वारा कराई गई मजिस्ट्रेट जांच में यह सिद्ध हो चुका था कि दोनों स्कूल एक ही जमीन पर चल रहे हैं, मान्यता फर्जी दस्तावेजों से ली गई है और राजस्व रिकार्ड में स्कूल की बताई गई जमीन अस्तित्व में ही नहीं है। यह जांच निष्पक्ष थी, कानूनन सही थी और स्थलीय निरीक्षण पर आधारित थी।
उच्च न्यायालय इलाहाबाद ने भी 17 जनवरी 2022 के आदेश में इस जांच को वैध माना और इसी के आधार पर निर्णय लेने का निर्देश दिया।
यानी सच्चाई स्थापित हो चुकी थी।
लेकिन यहीं से खेल शुरू हुआ।
शिक्षा विभाग में बैठी एक लॉबी को यह जांच पसंद नहीं आई, क्योंकि इससे प्रबंधक अवधेश मिश्रा कानूनन दोषी साबित होते थे। इसलिए 2023 में एक दूसरी जांच समिति बना दी गई। यह जांच बिना स्थल निरीक्षण, बिना राजस्व रिकॉर्ड और बिना 2020 की जांच को पढ़े की गई—और अंत में उसी तरह का परिणाम दिया जिसकी उम्मीद थी: दोषी को क्लीन चिट।
सीधी बात यह है कि 2023 की जांच का उद्देश्य सच्चाई खोजना नहीं, बल्कि पहले से मिली सच्चाई को दबाना था।
इस जांच में डीआईओएस नरेंद्र पाल सिंह, बीएसए और डीआईओएस कार्यालय के लिपिकों की भूमिका गंभीर रूप से संदिग्ध है। फाइल मैनेजमेंट और दस्तावेजों को छुपाकर प्रबंधक को अवैध लाभ पहुँचाया गया। यह सीधे-सीधे कानून का उल्लंघन है।
यह प्रकरण साबित करता है कि जब अधिकारी सच्चाई के खिलाफ खड़े हो जाएँ, तब अपराधियों को बचाना आसान हो जाता है और कानून कागज पर रह जाता है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस जांच को हाईकोर्ट ने संवैधानिक कहा, उसी जांच को विभाग ने “सारहीन” बनाने की कोशिश की।
यह सिर्फ प्रशासनिक गलती नहीं, बल्कि स्पष्ट भ्रष्टाचार और न्यायालय की अवमानना है।
अब जरूरत साफ है
उच्च न्यायालय को 2020 की जांच को अंतिम मानकर कार्रवाई का आदेश देना चाहिए।
2023 की जांच को अवैध घोषित करना चाहिए।
और पूरे प्रकरण का दोबारा उच्च स्तरीय स्थलीय निरीक्षण कराना चाहिए, क्योंकि जमीन, दस्तावेज और कब्जा—तीनों के रिकॉर्ड विभाग ने जानबूझकर छुपाए हैं।
सिस्टम तभी सुधरेगा जब अधिकारियों को यह समझ आए कि
सच को दबाने की कीमत झूठ को बचाने से कहीं ज्यादा भारी होती है।






