राजनीति की प्रयोगशाला में इतिहास को हथियार बनाने का खेल

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भारत का इतिहास तारीखों से नहीं, बल्कि उन तारीखों पर दोहराए जाने वाले राजनीतिक नाटकों से घायल होता है। 6 दिसंबर ऐसी ही एक तारीख है—एक ऐसी तिथि जिसे देश ने सिर्फ देखा नहीं, बल्कि झेला है। और दुखद यह है कि तीन दशक बाद भी हम इसे इतिहास की गलती नहीं, बल्कि राजनीति की पूंजी की तरह इस्तेमाल होते देखते हैं।
6 दिसंबर 1992 सिर्फ एक विवादित ढांचे के गिरने का दिन नहीं था; यह उस विश्वास के ढहने का दिन था जो भारत की विविधता को बांधकर रखता था।
राजनीतिक लाभ के लिए जनता की भावनाओं को भड़काया गया, सड़कों को धर्म की रणभूमि बनाया गया, और सत्ता की राजनीति ने समाज को ऐसी खाई में धकेल दिया जिसका असर आज भी महसूस होता है।
और दुर्भाग्य यह है कि यह सिलसिला रुका नहीं—आज भी जारी है।
एक ओर सत्ता पक्ष इस दिन का इस्तेमाल अपनी वैचारिक जीत के प्रतीक के रूप में करता है, जबकि विपक्ष इसे लोकतांत्रिक शर्म का दिन बताकर चुनावी मंच गर्म करता है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या दोनों पक्ष जनता को मुद्दों से भटकाने का खेल नहीं खेल रहे?
देश में बेरोज़गारी चरम पर है,
किसान संकट लगातार बढ़ रहा है,
शिक्षा और स्वास्थ्य की हालत किसी से छिपी नहीं,
भ्रष्टाचार नई ऊंचाइयों पर है,
लेकिन 6 दिसंबर आते ही पूरी राजनीति अचानक विकास से मुड़कर धर्म के चौखट पर खड़ी हो जाती है।
यह संयोग नहीं—रणनीति है।
भारत की राजनीति में 6 दिसंबर हर बार यह सिद्ध करता है कि धर्म भावनाओं को उभार सकता है, और उभरी हुई भावनाओं पर वोट की फसल काटी जा सकती है।
चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष—दोनों की सुविधा इसी में है कि समाज बंटा रहे, बहस भावनात्मक रहे और जनता वास्तविक मुद्दों को भूल जाए।
युवा पीढ़ी का सवाल है,कब तक इतिहास की राख में भविष्य जलता रहेगा?
आज भारत की आधी आबादी युवा है। वे आधुनिक भारत चाहते हैं—स्टार्टअप, रोजगार, तकनीक, शिक्षा और अवसरों वाला भारत।
लेकिन उनकी ऊर्जा को दिशा देने के बजाय उन्हें 1992 की धूल भरी बहसों में उलझाना—यह युवा भारत के साथ सबसे बड़ा छल है।
6 दिसंबर का राजनीतिक शोर असल में युवाओं की महत्वाकांक्षाओं को दबा देता है।
यह सच बोलना जरूरी है:
राजनीति को बदलाव नहीं चाहिए, उसे विवाद चाहिए।
भारत का संविधान स्पष्ट कहता है—समानता, नैतिकता, धर्मनिरपेक्षता और न्याय।
लेकिन राजनीति बार-बार बताती है कि सत्ता का रास्ता विभाजन और ध्रुवीकरण से होकर गुजरता है।
6 दिसंबर इसलिए खतरनाक है क्योंकि यह दोनों के बीच टकराव का प्रतीक बन चुका है।
जब देश का भविष्य तय करने वाले कानून, विकास और नीतियों पर चर्चा होनी चाहिए, तब नेताओं की भाषा मंदिर-मस्जिद और धार्मिक ध्रुवीकरण पर अटकी रहती है।
यह लोकतंत्र की अपमानजनक विडंबना है।
6 दिसंबर हमें याद दिलाता है कि राजनीति ने समाज को बंटा कर रखा है — और यह विभाजन सत्ता की रणनीति है।
6 दिसंबर की असली त्रासदी यह नहीं है कि इतिहास में क्या हुआ;
असली त्रासदी यह है कि वर्तमान की राजनीति उस इतिहास से लाभ उठाती है।
यह तारीख एक ऐसी प्रयोगशाला बन चुकी है जहाँ भावनाओं को उबालकर वोट बैंक बनाया जाता है।
अब समय आ गया है कि नागरिक और खासकर युवा यह सवाल पूछें—
हम कब तक राजनीतिक खेल के मोहरे बने रहेंगे?
कब तक इतिहास को हथियार बनाकर हमारे भविष्य को बंधक रखा जाएगा?
जब समाज इन सवालों के जवाब मांगना शुरू कर देगा, तभी 6 दिसंबर विवाद की तारीख नहीं, चेतना की तारीख बनेगा।

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