चुनावी प्रक्रिया पर हमला—लोकतंत्र को हल्के में लेने की खतरनाक प्रवृत्ति

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फर्रुखाबाद के तुर्कीपुर गांव में बीएलओ पर हुआ हमला सिर्फ एक व्यक्ति की उग्रता भर नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति बढ़ती उदासीनता और बदसलूकी का प्रतीक है। भारत निर्वाचन आयोग के एसआईआर कार्यक्रम के दौरान बीएलओ उर्मिला देवी के साथ हुई अभद्रता और हिंसक व्यवहार न सिर्फ कानून का उल्लंघन है, बल्कि उस जिम्मेदारी का अपमान भी है जिसे वे पूरे लोकतंत्र की मजबूती के लिए निभा रही थीं।
एक फॉर्म भरने, जमा करने या सत्यापन जैसे कार्यों को लेकर इस प्रकार का आक्रोश यह सवाल उठाता है कि क्या हम मतदाता होने की जिम्मेदारियों को समझ भी रहे हैं?
बीएलओ कोई निजी कर्मचारी नहीं, बल्कि लोकतंत्र के प्रहरी हैं—उनके साथ ऐसा अमर्यादित व्यवहार केवल व्यक्तिगत हमला नहीं, बल्कि चुनावी व्यवस्था को चोट पहुँचाने जैसा है।
अनस उर्फ़ गुड्डू द्वारा फॉर्म फाड़ना और उन्हें बीएलओ के चेहरे पर फेंकना उस मानसिकता का हिस्सा है जिसमें व्यक्ति कानून और प्रक्रिया को अपने सामने कुछ नहीं समझता। एक महिला अधिकारी को गालियाँ देना और धमकाना समाज की उस दुरुस्त करने योग्य सोच की ओर भी इशारा करता है जहां जिम्मेदारी निभाने वाली महिलाओं को अक्सर प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है।
पुलिस द्वारा त्वरित कार्रवाई सराहनीय है, लेकिन असली सवाल यह है कि आखिर ऐसी घटनाएँ बार-बार क्यों हो रही हैं? निर्वाचन आयोग के किसी भी कार्यक्रम में हस्तक्षेप करना सीधा-सीधा लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमला है। चुनाव केवल राजनीतिक दलों का खेल नहीं, वह नागरिकों का अधिकार और कर्तव्य दोनों है। यदि समाज स्वयं इन प्रक्रियाओं का सम्मान नहीं करेगा, तो फिर लोकतंत्र के पहिये कहाँ तक सही दिशा में घूम पाएंगे?
यह घटना एक चेतावनी है—कि मतदान सूची पुनरीक्षण जैसा बुनियादी कार्य भी अब असहयोग, आक्रामकता और हिंसा का कारण बन रहा है। आवश्यक है कि समाज ऐसी प्रवृत्तियों को अस्वीकार करे और प्रशासनिक कर्मियों के साथ सम्मानजनक व्यवहार सुनिश्चित करने में भूमिका निभाए।
बीएलओ, आंगनबाड़ी, आशा, पटल कर्मी—ये सभी लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करते हैं। इनके कार्य में बाधा डालना किसी राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं, बल्कि देश की लोकतांत्रिक आत्मा के खिलाफ अपराध है।
समय आ गया है कि हम समझें—
लोकतंत्र सिर्फ वोट देने से नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया को सहज, सुरक्षित और सम्मानजनक बनाए रखने से भी चलता है।
तुर्कीपुर की यह घटना हमें याद दिलाती है कि यदि हम जिम्मेदार नागरिक नहीं बनेंगे, तो लोकतंत्र की मजबूती केवल किताबों तक सीमित रह जाएगी।

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