शरद कटियार
उत्तर प्रदेश में विशेष प्रगाढ़ पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान बूथ लेवल अधिकारियों (बीएलओ) की लगातार हो रही मौतों ने पूरे चुनावी तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। लोकतंत्र की सबसे बुनियादी कड़ी माने जाने वाले ये अधिकारी मतदाता सूची को मजबूत और पारदर्शी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन आज वही कर्मचारी व्यवस्था की अव्यवस्था और असहनीय कार्यदबाव के कारण अपनी जान गंवा रहे हैं। यह न सिर्फ एक प्रशासनिक असफलता है, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा को घायल करने वाला मानवीय संकट है।
बीते कुछ सप्ताहों में उत्तर प्रदेश में सात से अधिक बीएलओ की मौतें दर्ज की जा चुकी हैं—कहीं दिल का दौरा, कहीं सड़क हादसा और कहीं आत्महत्या। मुरादाबाद के भोजपुर निवासी 42 वर्षीय बीएलओ सर्वेश सिंह की आत्महत्या ने इस त्रासदी को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया। सर्वेश का वीडियो संदेश साफ दर्शाता है कि वे लक्ष्य पूरा न कर पाने के दबाव और भय में जी रहे थे। इसी तरह बिजनौर की 56 वर्षीय शोभारानी की मौत दिल का दौरा पड़ने से हुई, जबकि उनकी ड्यूटी निरंतर घंटों तक चल रही थी।
इन घटनाओं से यह तथ्य बिल्कुल स्पष्ट है कि एसआईआर के लिए तय समयसीमा और कार्यभार वास्तविक परिस्थितियों से मेल नहीं खाते। बूथ लेवल ऑफिसरों को घर-घर जाकर सत्यापन करना, ऑनलाइन डेटा अपडेट करना, दस्तावेज़ी प्रक्रिया पूरी करना और साथ ही स्कूल या अन्य विभागीय जिम्मेदारियों का निर्वहन करना पड़ता है। इसके बावजूद न तो उन्हें पर्याप्त प्रशिक्षण दिया गया, न तकनीकी सहायता, न स्वास्थ्य सुरक्षा और न ही मानसिक दबाव से बचाने के लिए कोई व्यवस्था।
दुर्भाग्य यह है कि चुनावी तंत्र की इस सबसे कमजोर कड़ी को सबसे भारी जिम्मेदारी दी गई, लेकिन सुरक्षा और सम्मान में वे सबसे पीछे रखे गए। चुनाव आयोग और राज्य प्रशासन का यह तर्क कि लक्ष्य जरूरी है और समयसीमा अनिवार्य—मानवीय संवेदनाओं से दूर एक यांत्रिक सोच दर्शाता है। लोकतंत्र मशीनों से नहीं, मनुष्यों से चलता है। और जब व्यवस्था मनुष्य को खत्म कर देना शुरू कर दे, तो सुधार नहीं, क्रांति की जरूरत पड़ती है।
जरूरी है कि बीएलओ की मौतों को महज व्यक्तिगत त्रासदियों के रूप में न देखा जाए। यह एक व्यवस्था की विफलता है। सरकार और चुनाव आयोग को तुरंत एसआईआर प्रक्रिया की समीक्षा करनी चाहिए, लक्ष्य घटाने चाहिए, डेडलाइन बढ़ानी चाहिए और बीएलओ को हेल्थ इंश्योरेंस, पर्याप्त मानदेय, सुरक्षा उपबंध, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और तकनीकी सपोर्ट उपलब्ध कराना चाहिए। साथ ही मृतक कर्मचारियों के परिवारों को आर्थिक सहायता और आश्रितों को नौकरी मिलनी ही चाहिए।
लोकतंत्र की सेहत तभी मजबूत रह सकती है जब उसकी बुनियाद मजबूत हो। बीएलओ उस बुनियाद का पहला पत्थर हैं। अगर वे ही टूटते और बिखरते रहेंगे तो चुनावों की विश्वसनीयता और पूरे लोकतांत्रिक ढांचे पर प्रश्नचिह्न लगना तय है। उत्तर प्रदेश की ये मौतें केवल आंकड़ा नहीं—एक चेतावनी हैं। अब समय है कि व्यवस्था आत्ममंथन करे और बदलाव की दिशा में निर्णायक कदम उठाए।




