दहेज प्रथा के खिलाफ उठी उम्मीद की आवाज: रक्षित राणा का कदम समाज के लिए प्रेरक संदेश

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भारतीय समाज में दहेज प्रथा लंबे समय से एक गहरी जड़ें जमाए कुरीति रही है, जिसने अनगिनत परिवारों को आर्थिक बोझ, मानसिक उत्पीड़न और सामाजिक असमानता की ओर धकेला है। तमाम कानूनों और जागरूकता अभियानों के बावजूद यह प्रथा आज भी कई जगह अपने पुराने रूप में मौजूद है। ऐसे दौर में बागपत के बड़ौत कस्बे के रहने वाले रक्षित राणा द्वारा सगाई में लड़की पक्ष का 21 लाख रुपये का चेक लौटा देना न केवल साहसिक कदम है, बल्कि समाज के लिए आशा की नई किरण भी है।
यह कदम किसी औपचारिक भाषण या बड़ी रैली के जरिए नहीं, बल्कि एक पारिवारिक कार्यक्रम के मंच पर उठाया गया। तिलक के नाम पर दिए जा रहे चेक को रक्षित ने दहेज की मानसिकता का प्रतीक बताया और साफ शब्दों में कहा कि शादी किसी सौदेबाजी का अवसर नहीं है। उनका संदेश सरल था—दहेज अभिशाप है, और इसे खत्म करना युवा पीढ़ी की जिम्मेदारी है।
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में जिस तरह मौजूद लोग तालियां बजाते दिखे, वह बताता है कि समाज के भीतर दहेज जैसी जड़बद्ध कुरीतियों को खत्म करने की इच्छा मौजूद है—बस उसे दिशा देने के लिए रक्षित जैसे युवाओं की जरूरत है।
रक्षित का यह निर्णय केवल एक परिवार पर लागू हुआ ऐसा कदम नहीं है, बल्कि यह एक सांकेतिक परिवर्तन है जो बताता है कि यदि युवा अपनी भूमिका समझें, तो सामाजिक सुधार किसी सरकारी आदेश या कानून की मोहताज नहीं रहते। दहेज प्रथा पर अंकुश तभी लगेगा जब दूल्हे के परिवार अपनी जिम्मेदारी समझें और इस कुरीति को स्पष्ट रूप से नकारें।

लड़की पक्ष द्वारा इस निर्णय का सम्मान किया जाना यह दर्शाता है कि परिवर्तन की शुरुआत हमेशा विरोध से नहीं होती—कभी-कभी एक सही कदम पूरे माहौल को सकारात्मक बना देता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि रक्षित राणा जैसे उदाहरणों को समाज में व्यापक रूप से चर्चा का विषय बनाया जाए, ताकि यह संदेश और तेज़ी से फैले कि सम्मान और समानता पर आधारित विवाह ही आधुनिक समाज की पहचान है, न कि दिखावे या लेन-देन पर आधारित रिश्ते।
दहेज प्रथा को समाप्त करने के लिए कानून मौजूद हैं, लेकिन बदलाव की असली ताकत समाज के भीतर से ही आती है। रक्षित राणा का कदम इसी दिशा में एक सशक्त और प्रेरणादायक पहल है—जो शायद आने वाले समय में कई और युवाओं को दहेज के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा दे।

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