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Sunday, April 12, 2026

हर दिन बिगड़ती बिजली व्यवस्था पर सीएम का खुद मोर्चा संभालना संवेदनशीलता

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शरद कटियार
उत्तर प्रदेश में बिजली व्यवस्था को लेकर बढ़ती अव्यवस्थाओं, उपभोक्ताओं की लगातार शिकायतों और स्मार्ट मीटर से उपजे असंतोष के बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का सीधे हस्तक्षेप करना अब एक प्रशासनिक निर्णय से आगे बढ़कर राजनीतिक और सामाजिक आवश्यकता बन चुका है। हालात यह हैं कि बिजली, जो आम जनजीवन की बुनियादी जरूरत है, वही अब असंतोष और अविश्वास का कारण बनती जा रही है।
उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन लिमिटेड द्वारा शुरू किया गया 7 दिवसीय विशेष अभियान पहली नजर में त्वरित राहत का प्रयास जरूर दिखता है, लेकिन इसके पीछे छिपा संदेश कहीं अधिक गंभीर है—व्यवस्था में गहराई तक बैठ चुकी खामियों को स्वीकार करना और उन्हें सुधारने की मजबूरी।
स्मार्ट मीटर को लेकर जो तस्वीर सामने आई है, वह योजनाओं और जमीनी सच्चाई के बीच के अंतर को उजागर करती है। तकनीक को पारदर्शिता और सुविधा का माध्यम बनना था, लेकिन कई स्थानों पर यह उपभोक्ताओं के लिए परेशानी का कारण बन गई। अचानक बढ़े हुए बिजली बिल, ओवर बिलिंग की शिकायतें, रिचार्ज के बावजूद कनेक्शन बहाल न होना और हेल्पलाइन पर संतोषजनक जवाब न मिलना—ये सब मिलकर उपभोक्ताओं के मन में अविश्वास पैदा कर चुके हैं।
ऐसे में मुख्यमंत्री का यह निर्देश कि अधिकारी घर-घर जाकर समस्याओं को समझें और उनका समाधान करें, प्रशासनिक सोच में बदलाव का संकेत है। यह पहली बार नहीं है जब किसी योजना में सुधार के लिए अभियान चलाया जा रहा हो, लेकिन इस बार अंतर यह है कि समस्या सीधे आम जनता की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी है और इसका असर व्यापक है।
हर अधिकारी को निश्चित संख्या में उपभोक्ताओं की जिम्मेदारी देना जवाबदेही तय करने की दिशा में एक अहम कदम है। लेकिन असली सवाल यही है कि क्या यह जिम्मेदारी सिर्फ कागजों तक सीमित रहेगी या वास्तव में अधिकारी जमीनी स्तर पर सक्रिय होकर समस्याओं का समाधान करेंगे? क्योंकि अब तक की स्थिति यह रही है कि शिकायत दर्ज होने के बाद भी समाधान में देरी या लापरवाही आम बात रही है।
गलत बिलिंग पर कार्रवाई के निर्देश भी महत्वपूर्ण हैं। बिजली बिल किसी भी परिवार के बजट का एक बड़ा हिस्सा होता है, और यदि उसमें त्रुटि हो तो उसका सीधा असर आम आदमी की आर्थिक स्थिति पर पड़ता है। ऐसे में सिर्फ बिल सुधार देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई करना ही विश्वास बहाली का रास्ता हो सकता है।
निगेटिव बैलेंस के कारण कनेक्शन कटने की समस्या यह भी बताती है कि डिजिटल सिस्टम लागू करते समय उपभोक्ताओं की व्यवहारिक कठिनाइयों को पूरी तरह नहीं समझा गया। ग्रामीण क्षेत्रों और कम शिक्षित उपभोक्ताओं के लिए यह प्रणाली अभी भी जटिल है। ऐसे में तकनीक के साथ मानवीय दृष्टिकोण अपनाना अनिवार्य हो जाता है।
मुख्यमंत्री का खुद इस मुद्दे पर सक्रिय होना यह दर्शाता है कि सरकार अब केवल योजनाएं बनाने तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि उनके प्रभाव को लेकर भी गंभीर है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि किसी भी व्यवस्था की असली तस्वीर उसके निचले स्तर पर दिखती है। यदि वहां सुधार नहीं हुआ, तो ऊपर से किए गए प्रयास भी सीमित प्रभाव ही छोड़ पाएंगे।
यह अभियान केवल शिकायतों के निस्तारण तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे एक व्यापक सुधार प्रक्रिया की शुरुआत बनाना होगा। बिजली विभाग में पारदर्शिता, जवाबदेही और संवेदनशीलता—ये तीनों तत्व अगर मजबूत होते हैं, तभी वास्तविक बदलाव संभव है।
आज प्रदेश एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां तकनीक और प्रशासन दोनों की परीक्षा हो रही है। जनता सिर्फ समाधान नहीं, बल्कि भरोसा चाहती है। और यह भरोसा केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि लगातार दिखने वाले बदलाव से ही बनता है।
यदि यह अभियान उस भरोसे को पुनः स्थापित कर सका, तो यह सिर्फ बिजली व्यवस्था का सुधार नहीं होगा—यह शासन और जनता के बीच संबंधों में भी एक सकारात्मक बदलाव की शुरुआत साबित हो सकता है।

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