केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का यह बयान कि असम में सरकार बनने पर समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू की जाएगी और बहुविवाह पर रोक लगेगी, केवल एक चुनावी घोषणा नहीं है, बल्कि यह एक बड़े वैचारिक और सामाजिक विमर्श को जन्म देने वाला मुद्दा है। यह विषय वर्षों से भारतीय राजनीति, समाज और न्याय व्यवस्था के केंद्र में रहा है, लेकिन हर बार इसे लागू करने की दिशा में ठोस सहमति बन पाना चुनौतीपूर्ण साबित हुआ है।
यूसीसी का मूल सिद्धांत यह है कि देश के सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून हो—चाहे वह विवाह हो, तलाक, उत्तराधिकार या अन्य व्यक्तिगत अधिकारों से जुड़े विषय। संविधान के नीति निदेशक तत्वों में भी इसका उल्लेख है, जो राज्य को यह दिशा देता है कि वह नागरिकों के लिए समान कानून सुनिश्चित करे। लेकिन भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में, जहां धर्म, परंपराएं और सामाजिक संरचनाएं बेहद जटिल हैं, वहां इस तरह के कानून को लागू करना केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक चुनौती भी है।
अमित शाह के बयान में सबसे अधिक जोर बहुविवाह पर रोक और महिलाओं के अधिकारों पर दिया गया है। यह तर्क काफी हद तक मजबूत भी है, क्योंकि समानता और न्याय की दृष्टि से देखा जाए तो महिलाओं को समान अधिकार मिलना आवश्यक है। लेकिन सवाल यह भी उठता है कि क्या यूसीसी का मुद्दा केवल महिलाओं के अधिकारों तक सीमित है, या इसके पीछे एक व्यापक राजनीतिक रणनीति भी काम कर रही है?
विपक्ष अक्सर यह आरोप लगाता रहा है कि यूसीसी जैसे मुद्दों को चुनावी समय में उछालकर सामाजिक ध्रुवीकरण की कोशिश की जाती है। वहीं, सत्तापक्ष इसे सामाजिक सुधार और समानता की दिशा में आवश्यक कदम बताता है। सच्चाई शायद इन दोनों के बीच कहीं स्थित है। यह भी स्पष्ट है कि यूसीसी जैसा विषय केवल बहस या बयानबाजी से नहीं, बल्कि व्यापक संवाद, विश्वास निर्माण और सभी समुदायों की सहभागिता से ही आगे बढ़ सकता है।
एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि क्या देश की प्राथमिकताएं इस समय यूसीसी जैसी बहस हैं, या फिर बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे अधिक तत्काल समाधान की मांग करते हैं? सरकारों के लिए संतुलन बनाना हमेशा चुनौतीपूर्ण होता है—जहां एक ओर दीर्घकालिक सामाजिक सुधार जरूरी हैं, वहीं दूसरी ओर तात्कालिक समस्याओं का समाधान भी उतना ही आवश्यक है।
असम को यूसीसी के प्रयोग के रूप में प्रस्तुत करना एक रणनीतिक कदम भी माना जा सकता है। यदि राज्य स्तर पर इसे लागू किया जाता है और इसके सकारात्मक परिणाम सामने आते हैं, तो यह अन्य राज्यों और पूरे देश के लिए एक मॉडल बन सकता है। लेकिन यदि इसे बिना पर्याप्त तैयारी और सहमति के लागू किया गया, तो यह सामाजिक असंतोष को भी जन्म दे सकता है।
अंततः, यूसीसी का सवाल केवल कानून का नहीं, बल्कि विश्वास का है। जब तक समाज के सभी वर्गों को यह भरोसा नहीं होगा कि यह कानून उनके अधिकारों की रक्षा करेगा, तब तक इसका पूर्ण रूप से सफल होना कठिन है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि इस मुद्दे पर राजनीति से ऊपर उठकर एक संतुलित, संवेदनशील और समावेशी दृष्टिकोण अपनाया जाए।
यूसीसी निश्चित रूप से एक बड़ा सुधार हो सकता है, लेकिन इसे लागू करने का तरीका ही तय करेगा कि यह समाज को जोड़ता है या और अधिक विभाजित करता है। यही इस पूरे विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।
समान नागरिक संहिता पर सियासत: सुधार, समानता या राजनीतिक रणनीति?


