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Friday, March 27, 2026

मासूम बचपन पर मंडराता संकट: आंकड़ों से आगे बढ़कर जवाबदेही की जरूरत

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शरद कटियार

भारत की विकास यात्रा जितनी तेज़ दिखाई देती है, उतनी ही गहरी एक खामोश त्रासदी इसके भीतर छिपी है—बाल मृत्यु दर की त्रासदी। जब हर हजार में 29 बच्चे पांच साल की उम्र से पहले दम तोड़ देते हों और हर साल लाखों मासूम असमय मौत के शिकार हो जाते हों, तो यह केवल स्वास्थ्य का आंकड़ा नहीं, बल्कि एक राष्ट्र की संवेदनशीलता की परीक्षा बन जाता है।

यह प्रश्न बार-बार उठता है कि आखिर वह कौन-सी कमी है जो इतने वर्षों की योजनाओं, बजट और दावों के बावजूद बच्चों की जिंदगी को सुरक्षित नहीं बना पा रही। इसका उत्तर सीधा भी है और जटिल भी—नीतियां हैं, लेकिन उनका असर हर घर तक नहीं पहुंच पा रहा।

सबसे बड़ी चुनौती कुपोषण की है। देश के कई हिस्सों में आज भी बच्चे पर्याप्त पोषण से वंचित हैं। गर्भ में ही पोषण की कमी शुरू हो जाती है, जो जन्म के बाद और गंभीर हो जाती है। कमजोर शरीर, कमजोर प्रतिरोधक क्षमता और फिर छोटी-छोटी बीमारियां—जो विकसित देशों में आसानी से ठीक हो जाती हैं—यहां जानलेवा बन जाती हैं।

स्वास्थ्य सेवाओं की असमान उपलब्धता भी इस संकट को बढ़ाती है। शहरों में जहां आधुनिक अस्पताल और सुविधाएं उपलब्ध हैं, वहीं गांवों में आज भी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की स्थिति संतोषजनक नहीं है। कई जगह डॉक्टर नहीं, दवाइयां नहीं और समय पर एम्बुलेंस तक नहीं मिलती। ऐसे में एक सामान्य बीमारी भी गंभीर रूप ले लेती है।

टीकाकरण और जागरूकता के क्षेत्र में भी अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। कई परिवारों तक आज भी यह जानकारी पूरी तरह नहीं पहुंच पाती कि बच्चे के जीवन के पहले पांच साल कितने महत्वपूर्ण होते हैं। साफ-सफाई, शुद्ध पानी और पोषण जैसे बुनियादी पहलू भी कई क्षेत्रों में अब भी चुनौती बने हुए हैं।

सरकारी योजनाओं की बात करें तो कागजों पर तस्वीर उम्मीद जगाती है। पोषण अभियान, जननी सुरक्षा योजना, आंगनवाड़ी सेवाएं और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन जैसे कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या इनका लाभ हर उस बच्चे तक पहुंच रहा है, जिसे इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है? जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार, लापरवाही और संसाधनों की कमी इन योजनाओं के प्रभाव को सीमित कर देती है।

यह भी सच है कि यह समस्या केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। समाज, परिवार और स्थानीय समुदायों की भूमिका भी उतनी ही अहम है। जब तक हम बच्चों के स्वास्थ्य को प्राथमिकता नहीं देंगे, तब तक बदलाव अधूरा रहेगा।

आज जरूरत केवल आंकड़े गिनने की नहीं, बल्कि उन आंकड़ों के पीछे छिपी सच्चाई को समझने की है। हर वह बच्चा जो पांच साल से पहले दुनिया छोड़ देता है, वह केवल एक संख्या नहीं, बल्कि एक अधूरी कहानी है—एक ऐसा भविष्य जो कभी पूरा नहीं हो सका।

अगर देश को वास्तव में विकसित बनना है, तो सबसे पहले अपने बच्चों को सुरक्षित और स्वस्थ बनाना होगा।

अब समय आ गया है कि बाल स्वास्थ्य को केवल योजना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया जाए। जवाबदेही तय हो, क्रियान्वयन मजबूत हो और हर स्तर पर संवेदनशीलता दिखाई दे—तभी वह दिन आएगा जब कोई भी बच्चा केवल इसलिए अपनी जिंदगी न गंवाए, क्योंकि उसे समय पर देखभाल नहीं मिल सकी।

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