शरद कटियार
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और युद्ध जैसे हालात केवल उस क्षेत्र तक सीमित नहीं रहते, बल्कि उनका प्रभाव पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार पर पड़ता है। भारत जैसे देश, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर होकर पूरा करते हैं, ऐसे अंतरराष्ट्रीय संकटों से सीधे प्रभावित होते हैं। मौजूदा परिस्थितियों में यह आशंका जताई जा रही है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबे समय तक बना रहता है, तो भारत में गैस और ईंधन की आपूर्ति तथा उनकी कीमतों पर भी असर पड़ सकता है।
भारत दुनिया के उन बड़े देशों में शामिल है, जिनकी ऊर्जा आवश्यकताएं तेजी से बढ़ रही हैं। देश अपनी जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात होने वाले कच्चे तेल और गैस से पूरा करता है। सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात और कतर जैसे देश भारत के प्रमुख ऊर्जा आपूर्तिकर्ता हैं।
ऐसे में यदि पश्चिम एशिया में युद्ध या सैन्य तनाव बढ़ता है, तो सबसे पहले तेल और गैस की आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होती है। समुद्री मार्गों में बाधा, उत्पादन में कमी या सुरक्षा संकट के कारण वैश्विक बाजार में तेल और गैस की उपलब्धता घट सकती है। इसका सीधा असर उन देशों पर पड़ता है जो आयात पर निर्भर हैं।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार बेहद संवेदनशील होता है। जरा सा राजनीतिक तनाव भी कच्चे तेल की कीमतों को ऊपर-नीचे कर देता है। पिछले कुछ वर्षों में यह कई बार देखा गया है कि पश्चिम एशिया में संघर्ष बढ़ते ही तेल की कीमतों में अचानक उछाल आ जाता है।
यदि मौजूदा संकट लंबा खिंचता है तो पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कीमतों में वृद्धि की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। भारत में पहले से ही महंगाई एक बड़ी चिंता है और यदि ईंधन महंगा होता है तो उसका असर परिवहन, उद्योग और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ेगा।
आम आदमी की रसोई पर असर
रसोई गैस यानी एलपीजी आज लगभग हर घर की जरूरत बन चुकी है। भारत में करोड़ों परिवार खाना बनाने के लिए गैस सिलेंडर पर निर्भर हैं। यदि वैश्विक बाजार में गैस महंगी होती है या आपूर्ति बाधित होती है, तो इसका सीधा असर आम परिवारों की रसोई पर पड़ेगा।
ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी केवल रसोई तक सीमित नहीं रहती। पेट्रोल और डीजल महंगे होने से परिवहन लागत बढ़ती है, जिससे खाद्यान्न, सब्जियों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ जाती हैं।
ऐसे समय में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि वह ऊर्जा आपूर्ति को संतुलित बनाए रखे और आम लोगों पर आर्थिक बोझ कम से कम पड़े। भारत के पास कुछ हद तक रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार मौजूद हैं, जो आपात स्थिति में कुछ समय तक राहत दे सकते हैं।
साथ ही सरकार वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों, नए आपूर्ति समझौतों और ऊर्जा विविधीकरण की दिशा में भी प्रयास कर रही है। हाल के वर्षों में भारत ने रूस, अमेरिका और अन्य देशों से भी ऊर्जा आयात बढ़ाने की रणनीति अपनाई है, ताकि किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम की जा सके।
यह संकट एक बार फिर यह संकेत देता है कि भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में दीर्घकालिक रणनीति अपनाने की जरूरत है। अक्षय ऊर्जा, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और हरित हाइड्रोजन जैसे विकल्पों पर तेजी से काम करना अब समय की मांग बन गया है।
यदि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा घरेलू स्रोतों से पूरा करने में सक्षम हो जाता है, तो वैश्विक संकटों का असर काफी हद तक कम किया जा सकता है।
पश्चिम एशिया का मौजूदा तनाव केवल एक क्षेत्रीय राजनीतिक संकट नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। भारत के लिए यह समय सतर्क रहने और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने का है।
आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अंतरराष्ट्रीय हालात किस दिशा में जाते हैं और भारत किस प्रकार अपनी ऊर्जा आपूर्ति तथा आर्थिक संतुलन को बनाए रखने में सफल होता है। यदि हालात जल्द सामान्य नहीं होते, तो इसका असर आम आदमी की जेब और रसोई दोनों पर महसूस किया जा सकता है।
पश्चिम एशिया का संकट और भारत की ऊर्जा सुरक्षा: क्या बढ़ेगी आम आदमी की चिंता?


