पश्चिम एशिया में जारी ईरान-इजराइल संघर्ष अब केवल दो देशों के बीच का सैन्य टकराव भर नहीं रह गया है। इसकी गूंज दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं में सुनाई देने लगी है और भारत भी इससे अछूता नहीं है। वैश्विक व्यापार मार्गों में बढ़ती अस्थिरता, कच्चे माल की कीमतों में उछाल और शिपिंग लागत में तेजी से वृद्धि ने भारतीय उद्योग जगत के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। विशेष रूप से छोटे और मध्यम उद्योग (एमएसएमई) इस संकट की सबसे बड़ी मार झेलते दिखाई दे रहे हैं।
उद्योग संगठनों के ताजा आकलन बताते हैं कि देशभर में 800 से अधिक एमएसएमई इकाइयां गंभीर संकट की स्थिति में पहुंच चुकी हैं। इनमें कार्टन बॉक्स निर्माण, पैकेजिंग उद्योग, स्नैक्स व खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां और छोटे स्तर की फैब्रिकेशन यूनिटें प्रमुख रूप से शामिल हैं। यदि हालात लंबे समय तक ऐसे ही बने रहे तो इन उद्योगों में काम करने वाले हजारों श्रमिकों के रोजगार पर भी सीधा खतरा उत्पन्न हो सकता है।
दरअसल, इन उद्योगों की उत्पादन प्रक्रिया का बड़ा हिस्सा पेट्रोलियम आधारित कच्चे माल और विभिन्न रसायनों पर निर्भर करता है, जिनका महत्वपूर्ण स्रोत खाड़ी क्षेत्र और पश्चिम एशिया के देश हैं। युद्ध के कारण इन क्षेत्रों से आपूर्ति बाधित होने लगी है, जिसके परिणामस्वरूप कच्चे माल की कीमतों में अचानक वृद्धि देखी जा रही है। उद्योग विशेषज्ञों के अनुसार पैकेजिंग और प्लास्टिक आधारित कच्चे माल की लागत में 20 से 25 प्रतिशत तक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसका सीधा असर उत्पादन लागत पर पड़ रहा है।
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कई उद्योगों में उत्पादन क्षमता 30 से 50 प्रतिशत तक घट चुकी है। कई इकाइयों ने आंशिक रूप से उत्पादन कम कर दिया है, जबकि कुछ इकाइयों को अस्थायी रूप से काम रोकने की स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। छोटे उद्योगों के लिए यह स्थिति इसलिए भी अधिक चुनौतीपूर्ण है क्योंकि उनके पास बड़े उद्योगों की तरह लंबी अवधि तक नुकसान सहने की आर्थिक क्षमता नहीं होती।
पश्चिम एशिया के साथ भारत का व्यापारिक संबंध काफी व्यापक है। ऊर्जा से लेकर रसायन और औद्योगिक कच्चे माल तक, कई क्षेत्रों में भारत इस क्षेत्र पर निर्भर रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार पिछले वर्ष भारत ने पश्चिम एशिया के देशों से करीब 98 अरब डॉलर से अधिक का आयात किया था। ऐसे में इस क्षेत्र में पैदा हुई अस्थिरता का सीधा प्रभाव भारतीय उद्योग और व्यापार पर पड़ना स्वाभाविक है।
युद्ध के कारण समुद्री व्यापार मार्गों पर जोखिम बढ़ गया है। जहाजरानी कंपनियां अब उच्च बीमा प्रीमियम ले रही हैं और कई रूटों पर माल ढुलाई की लागत बढ़ गई है। इससे निर्यातकों और आयातकों दोनों की लागत बढ़ी है। कई भारतीय कंपनियां अब नए निर्यात ऑर्डर लेने से पहले संभावित जोखिम और लागत का सावधानीपूर्वक आकलन कर रही हैं। परिणामस्वरूप व्यापारिक गतिविधियों की गति धीमी पड़ती दिखाई दे रही है।
इस संकट का सबसे चिंताजनक पहलू रोजगार से जुड़ा हुआ है। छोटे उद्योगों के संगठन लगातार यह चेतावनी दे रहे हैं कि यदि युद्ध लंबा खिंचता है और आपूर्ति शृंखला सामान्य नहीं होती, तो हजारों श्रमिकों की नौकरियां खतरे में पड़ सकती हैं। पैकेजिंग, खाद्य प्रसंस्करण और इंजीनियरिंग से जुड़े कई उद्योगों में पहले ही उत्पादन घटाया जा चुका है, जिससे श्रमिकों के कार्यदिवस और आय दोनों प्रभावित होने लगे हैं।
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक संघर्षों का असर अक्सर ऊर्जा और व्यापार मार्गों के माध्यम से अन्य देशों तक पहुंचता है। भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह स्थिति विशेष रूप से संवेदनशील होती है, क्योंकि यहां बड़ी संख्या में छोटे उद्योग अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं। यदि पश्चिम एशिया में तनाव जल्द कम नहीं हुआ तो इसका असर केवल कुछ उद्योगों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि व्यापक रूप से भारतीय निर्यात, उत्पादन और रोजगार पर भी पड़ सकता है।
ऐसे समय में आवश्यक है कि सरकार और उद्योग जगत मिलकर वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों की तलाश करें, लॉजिस्टिक व्यवस्था को मजबूत करें और छोटे उद्योगों को आवश्यक आर्थिक सहारा प्रदान करें। क्योंकि यदि एमएसएमई क्षेत्र पर संकट गहराता है तो उसका प्रभाव केवल उद्योगों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश की समग्र आर्थिक गतिविधियों और लाखों परिवारों की आजीविका पर भी पड़ेगा।
पश्चिम एशिया का युद्ध और भारतीय उद्योगों पर मंडराता संकट


