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Monday, March 2, 2026

रंगों का पर्व और जिम्मेदार युवा

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शरद कटियार
होली भारतीय संस्कृति का जीवंत, उल्लासपूर्ण और सामाजिक समरसता का प्रतीक पर्व है।
यह केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि मन के मैल को धोने, रिश्तों में जमी दूरी को मिटाने और नए सिरे से संवाद स्थापित करने का अवसर है। भारतीय परंपरा में होली का महत्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक भी है।
लेकिन बदलते समय के साथ त्योहारों का स्वरूप भी बदल रहा है। डिजिटल युग में जहां हर उत्सव सोशल मीडिया पर प्रदर्शन और प्रतिस्पर्धा का माध्यम बनता जा रहा है, वहीं होली की मूल आत्मा—प्रेम, क्षमा, सौहार्द और समानता—कहीं धुंधली पड़ती दिखाई देती है। ऐसे समय में युवाओं की भूमिका निर्णायक हो जाती है।
आज त्योहारों का उत्साह कई बार लाइक्स, रील्स और वायरल वीडियो तक सीमित होकर रह जाता है। महंगे रंग, डीजे, और दिखावटी आयोजन होली की सादगी और आत्मीयता को पीछे छोड़ रहे हैं।
होली का वास्तविक अर्थ है—मन का रंग बदलना। यह पर्व हमें सिखाता है कि कटुता को त्यागकर संबंधों में मधुरता घोलें। यदि युवा इस संदेश को समझ लें, तो समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो सकता है।“बुरा न मानो होली है” की सीमाएं।दुर्भाग्य से कई बार “बुरा न मानो होली है” जैसे वाक्य का दुरुपयोग भी देखने को मिलता है। अनुशासनहीनता, नशाखोरी, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियां इस पावन पर्व की गरिमा को आहत करती हैं।
यही वह क्षण है जब नई पीढ़ी को नेतृत्व करना होगा। जिम्मेदार युवा वही है जो—किसी की इच्छा के विरुद्ध रंग न लगाए।महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान को प्राथमिकता दे।नशे और असामाजिक गतिविधियों से दूरी बनाए रखे।पर्यावरण के अनुकूल प्राकृतिक रंगों का उपयोग करे।
होली की असली जीत तभी है जब हर व्यक्ति सुरक्षित और सम्मानित महसूस करे।
रासायनिक रंगों से त्वचा और पर्यावरण दोनों को नुकसान पहुंचता है। जल की अनावश्यक बर्बादी भी गंभीर चिंता का विषय है। ऐसे में युवाओं को जागरूक होकर प्राकृतिक रंगों और सूखी होली जैसे विकल्पों को अपनाना चाहिए।
आज आवश्यकता है कि उत्सव के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया जाए।
होली और आत्मनिर्भरता
त्योहार केवल उत्सव नहीं, आर्थिक गतिविधियों का भी अवसर होते हैं। होली के अवसर पर स्थानीय कारीगर, रंग बनाने वाले, मिठाई विक्रेता और छोटे व्यापारी अपनी आजीविका कमाते हैं।
यदि युवा स्टार्टअप और स्वरोजगार की सोच के साथ इस पर्व को जोड़ें—जैसे ऑर्गेनिक गुलाल का उत्पादन, पर्यावरण अनुकूल उत्पादों की बिक्री, या सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन—तो यह आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक सकारात्मक कदम हो सकता है।
त्योहार को रोजगार और नवाचार से जोड़ना सामाजिक चेतना का विस्तार है।
होली केवल रंगों का विस्फोट नहीं, बल्कि चेतना का उत्सव है। यह हमें याद दिलाती है कि समाज में प्रेम, समानता और भाईचारा ही स्थायी रंग हैं।
युवा यदि इस पर्व को जिम्मेदारी, संवेदनशीलता और सकारात्मक सोच के साथ मनाएंगे, तो यह केवल एक दिन का उत्सव नहीं रहेगा—यह सामाजिक परिवर्तन की मिसाल बनेगा।
यूथ इंडिया का मानना है कि होली का भविष्य युवाओं के हाथ में है।
यदि नई पीढ़ी इसे अनुशासन, पर्यावरण संरक्षण, महिला सम्मान और आत्मनिर्भरता के संदेश के साथ जोड़ेगी, तो यह पर्व आने वाले समय में केवल परंपरा नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता का प्रतीक बन जाएगा।
रंग तभी सार्थक हैं जब वे रिश्तों में विश्वास और समाज में सद्भाव घोलें।यही जिम्मेदार युवा की पहचान है, और यही होली का सच्चा संदेश।

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