देश के औद्योगिक और वित्तीय परिदृश्य में 2,220 करोड़ रुपये के कथित ऋण अनियमितता मामले ने गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। चर्चित उद्योगपति अनिल अम्बानी के विरुद्ध Central ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टीगेशन (केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो) द्वारा दर्ज प्रकरण केवल एक व्यक्ति की कानूनी चुनौती नहीं है, बल्कि यह भारत की बैंकिंग प्रणाली, नियामकीय सतर्कता और कॉरपोरेट जवाबदेही की व्यापक परीक्षा भी है।
यह मामला बैंक ऑफ़ बड़ोदा की शिकायत पर पंजीकृत किया गया है। आरोप है कि वर्ष 2013 से 2017 के मध्य रिलायंस कम्युनिकेशन्स द्वारा प्राप्त ऋण का उपयोग स्वीकृत उद्देश्यों से भिन्न कार्यों में किया गया। फोरेंसिक परीक्षण में निधियों के कथित अनधिकृत स्थानांतरण (फंड डायवर्जन) के संकेत मिलने की बात कही जा रही है।
भारत में विशाल कॉरपोरेट समूहों को हजारों करोड़ रुपये के ऋण विकास योजनाओं और व्यावसायिक विस्तार के नाम पर स्वीकृत किए जाते हैं। किंतु यदि वही राशि अन्य दायित्वों के निपटान, संबंधित पक्षों को भुगतान अथवा अस्थायी निवेश में प्रयुक्त होती है, तो यह वित्तीय अनुशासन पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।
यदि कुल 31,580 करोड़ रुपये के ऋण में से बड़ी राशि का उपयोग निर्धारित परियोजनाओं के स्थान पर अन्य मदों में किया गया, तो स्वाभाविक रूप से कुछ मूलभूत प्रश्न उठते हैं—
क्या ऋण स्वीकृति के समय जोखिम का समुचित आकलन किया गया था?
क्या निगरानी तंत्र पर्याप्त और प्रभावी था?
क्या आंतरिक एवं बाह्य लेखा-परीक्षण समय रहते चेतावनी देने में सक्षम रहे?
बैंकिंग व्यवस्था की साख दांव पर
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक देश की आर्थिक रीढ़ माने जाते हैं। जब बड़े ऋण खाते अनियमितताओं के आरोपों में घिरते हैं, तो उसका सीधा प्रभाव आम जमाकर्ताओं के विश्वास पर पड़ता है। बैंकिंग प्रणाली की विश्वसनीयता केवल धन वसूली से नहीं, बल्कि पारदर्शी प्रक्रियाओं और कठोर निगरानी से भी निर्मित होती है।
इस संदर्भ में यह भी स्मरणीय है कि संबंधित कंपनी एक समय दूरसंचार क्षेत्र की प्रमुख इकाइयों में गिनी जाती थी, किंतु प्रतिस्पर्धा, बढ़ते कर्ज और बाजार परिस्थितियों के दबाव में अंततः दिवालियापन प्रक्रिया तक पहुंच गई। यह परिघटना भारतीय कॉरपोरेट जगत में अति-विस्तार और ऋण-निर्भर विकास मॉडल के जोखिमों को भी रेखांकित करती है।
इस प्रकरण में जांच एजेंसियों द्वारा की गई तलाशी एवं दस्तावेजों की जब्ती यह संकेत देती है कि मामला केवल प्रशासनिक जांच तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि विधिक परीक्षण की कसौटी पर भी परखा जाएगा। इससे पूर्व प्रवर्तन निदेशालय द्वारा की गई कार्रवाई ने भी इस प्रकरण की गंभीरता को रेखांकित किया है।
यह समय केवल दोषारोपण का नहीं, बल्कि संस्थागत सुधार का है। यदि आरोप सिद्ध होते हैं, तो यह स्पष्ट संदेश होना चाहिए कि आर्थिक अनियमितताओं के प्रति शून्य सहिष्णुता की नीति लागू है। और यदि आरोप निराधार सिद्ध होते हैं, तो उतनी ही पारदर्शिता के साथ तथ्यों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
अंततः, यह प्रकरण हमें स्मरण कराता है कि आर्थिक विकास की गति जितनी तीव्र होगी, उतनी ही सुदृढ़ निगरानी और नैतिक उत्तरदायित्व की आवश्यकता भी होगी। कॉरपोरेट शक्ति और वित्तीय अनुशासन के बीच संतुलन ही स्वस्थ अर्थव्यवस्था का आधार है।
2220 करोड़ ऋण प्रकरण: कॉरपोरेट आचरण, बैंकिंग पारदर्शिता और जवाबदेही की अग्निपरीक्षा


