– लंबित मामलों का पहाड़, जजों की कमी और सुधार एजेंडा क्यों हाशिये पर
भारत में न्याय तक पहुँच संविधानिक अधिकार है, लेकिन न्याय मिलने में लगने वाला समय और खर्च आज सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। देश की विभिन्न अदालतों में लंबित मामलों की संख्या 5 करोड़ के आसपास पहुँच चुकी है। राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (एनजेडीजी ) के सार्वजनिक डैशबोर्ड के अनुसार, अधीनस्थ न्यायालयों, उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय को मिलाकर कुल लंबित मामलों की संख्या 4.8–5.0 करोड़ के बीच रही है। यह आंकड़ा समय-समय पर बदलता रहता है, लेकिन प्रवृत्ति स्पष्ट है—मामलों का बोझ लगातार बढ़ रहा है।
यदि औसतन एक मुकदमे से 2–3 प्रत्यक्ष पक्षकार जुड़े मानें, तो करोड़ों नागरिक प्रत्यक्ष रूप से न्यायिक प्रक्रिया में उलझे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि-विवाद, शहरी इलाकों में संपत्ति और अनुबंध विवाद, पारिवारिक अदालतों में वैवाहिक मुकदमे, आपराधिक मामलों में जमानत और ट्रायल—न्यायिक तंत्र का लगभग हर हिस्सा दबाव में है। कुछ अध्ययनों के अनुसार, लंबित आपराधिक मामलों का बड़ा हिस्सा 5 वर्ष से अधिक पुराना है, जबकि कई दीवानी मुकदमे 10–20 वर्ष तक भी चलते हैं।
जजों की कमी इस संकट का एक बड़ा कारण है। विधि एवं न्याय मंत्रालय के हालिया आँकड़ों के अनुसार, अधीनस्थ न्यायालयों में हजारों पद स्वीकृत होने के बावजूद बड़ी संख्या में रिक्तियाँ बनी रहती हैं। उच्च न्यायालयों में भी स्वीकृत पदों के मुकाबले उल्लेखनीय रिक्तियाँ दर्ज की गई हैं। प्रति दस लाख आबादी पर जजों की संख्या भारत में विकसित देशों की तुलना में काफी कम मानी जाती है। विधि आयोग ने वर्षों पहले प्रति दस लाख आबादी पर जजों की संख्या बढ़ाने की सिफारिश की थी, लेकिन प्रगति अपेक्षित गति से नहीं हुई।
विलंब की कीमत सिर्फ समय नहीं है—यह आर्थिक और सामाजिक दोनों है। विश्व बैंक की ‘ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस’ रिपोर्टों में अनुबंध प्रवर्तन (इनफ़ोर्सइंग कॉन्ट्रैक्टस ) के मामले में भारत की रैंकिंग लंबे समय तक चुनौतीपूर्ण रही। एक औसत वाणिज्यिक विवाद के निपटारे में लगने वाला समय और लागत निवेश के माहौल को प्रभावित करती है। दूसरी ओर, विचाराधीन कैदियों की संख्या भी एक गंभीर प्रश्न है—राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी ) के आंकड़ों के अनुसार, जेलों में बंद कैदियों का बड़ा हिस्सा अंडरट्रायल होता है, यानी जिनका मुकदमा अभी पूरा नहीं हुआ।
इसके बावजूद, विडंबना यह है कि अधिकांश राजनीतिक दलों के घोषणा-पत्रों में न्यायिक सुधार व्यापक और ठोस रोडमैप के साथ शायद ही कभी प्रमुख मुद्दा बन पाता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, किसान, उद्योग—इन पर विस्तृत वादे मिलते हैं, लेकिन न्यायिक ढांचे में संरचनात्मक सुधार, प्रक्रिया सरलीकरण, न्यायालयों का डिजिटलीकरण, वैकल्पिक विवाद निपटान (एडीआर ) तंत्र का विस्तार, फास्ट-ट्रैक अदालतों की स्थायी व्यवस्था और जजों की नियुक्ति-प्रक्रिया में पारदर्शिता जैसे विषय सीमित उल्लेख तक सिमट जाते हैं।
हालांकि पिछले वर्षों में ई-कोर्ट्स परियोजना, वर्चुअल हियरिंग, राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड, लोक अदालतों और मध्यस्थता (मेडिएशन) को बढ़ावा देने जैसे कदम उठाए गए हैं, लेकिन इन पहलों का प्रभाव तभी व्यापक होगा जब उन्हें संसाधन, मानवबल और राजनीतिक प्राथमिकता मिले। केवल तकनीक से समस्या का समाधान नहीं होगा; न्यायिक प्रशासन, प्रक्रियात्मक कानूनों में संशोधन और जवाबदेही तंत्र को भी समानांतर रूप से सुदृढ़ करना होगा।
न्याय में देरी का अर्थ है—न्याय से वंचित होना। जब कोई किसान अपनी जमीन के मामले में वर्षों अदालतों के चक्कर लगाता है, जब कोई व्यापारी अनुबंध विवाद में फंसकर पूंजी अटका बैठा है, जब कोई परिवार पारिवारिक मुकदमे में भावनात्मक और आर्थिक रूप से टूट जाता है—तब यह सिर्फ व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि शासन-प्रणाली की चुनौती है।
अब सवाल यह है कि क्या न्यायिक सुधार को राष्ट्रीय राजनीतिक एजेंडा बनाया जाएगा? क्या दल अपने घोषणा-पत्रों में समयबद्ध न्याय, जजों की संख्या में वृद्धि, प्रक्रिया सुधार और जवाबदेही के स्पष्ट लक्ष्य तय करेंगे? या फिर करोड़ों लंबित मामलों का यह पहाड़ यूँ ही बढ़ता रहेगा?
लोकतंत्र में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका तीनों स्तंभ हैं। यदि न्यायपालिका पर बोझ असंतुलित है, तो लोकतंत्र की इमारत भी असंतुलित होगी। चुनावी विमर्श में न्यायिक सुधार को केंद्र में लाना समय की मांग है—क्योंकि न्याय सिर्फ अदालतों का विषय नहीं, यह नागरिकों के भरोसे का प्रश्न है।






