शरद कटियार
भारत और इस्राइल के संबंधों की कहानी केवल कूटनीति की नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक समीकरणों, राष्ट्रीय हितों और वैचारिक प्राथमिकताओं की भी दास्तान है। एक समय था जब जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने संयुक्त राष्ट्र में इस्राइल के गठन का विरोध किया था, और आज वही भारत नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में इस्राइल के साथ खुली और प्रगाढ़ रणनीतिक साझेदारी निभा रहा है। यह बदलाव आकस्मिक नहीं, बल्कि समय और परिस्थितियों की उपज है।
स्वतंत्रता आंदोलन की पृष्ठभूमि में भारत की विदेश नीति नैतिकता और उपनिवेशवाद-विरोधी दृष्टिकोण से प्रेरित थी। महात्मा गांधी का यह कथन कि “फलस्तीन अरबों का है” उस दौर की सोच को प्रतिबिंबित करता था। भारत ने 1947 की संयुक्त राष्ट्र विभाजन योजना के खिलाफ मतदान किया और लंबे समय तक इस्राइल से दूरी बनाए रखी। हालांकि 1950 में भारत ने इस्राइल को औपचारिक मान्यता दे दी, परंतु पूर्ण राजनयिक संबंध 1992 में ही स्थापित हो सके।
यह भी सच है कि 1962 के भारत-चीन युद्ध और 1965 व 1971 के युद्धों के दौरान इस्राइल ने परदे के पीछे भारत की मदद की। 1974 में भारत ने फलस्तीन मुक्ति संगठन (PLO) को मान्यता दी और 1988 में फलस्तीन को राष्ट्र के रूप में स्वीकार किया। शीत युद्ध की समाप्ति और आर्थिक उदारीकरण के बाद 1992 में दोनों देशों के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित हुए, जिसने सहयोग के नए आयाम खोले।
1999 के कारगिल युद्ध के दौरान इस्राइल से मिले रक्षा उपकरणों ने रिश्तों को नई मजबूती दी। 2003 में एरियल शेरोन की भारत यात्रा और 2017 में नरेंद्र मोदी की ऐतिहासिक इस्राइल यात्रा ने संबंधों को सार्वजनिक और रणनीतिक आयाम प्रदान किया। आज भारत इस्राइल के रक्षा उपकरणों का प्रमुख खरीदार है और कृषि, साइबर सुरक्षा, जल प्रबंधन व स्टार्टअप इकोसिस्टम में सहयोग निरंतर बढ़ रहा है।
लेकिन इस साझेदारी के साथ संतुलन की चुनौती भी है। भारत ऐतिहासिक रूप से फलस्तीन के अधिकारों का समर्थक रहा है और आज भी दो-राष्ट्र समाधान की वकालत करता है। पश्चिम एशिया में भारत के ऊर्जा, प्रवासी भारतीयों और व्यापारिक हित व्यापक हैं। ऐसे में भारत को इस्राइल के साथ घनिष्ठ संबंध रखते हुए अरब देशों के साथ अपने पारंपरिक रिश्तों को भी सहेजना है।
दरअसल, नेहरू युग की वैचारिक प्रतिबद्धता और मोदी युग की रणनीतिक स्पष्टता—दोनों ही अपने-अपने समय की आवश्यकताओं का परिणाम हैं। विदेश नीति का मूल मंत्र अंततः राष्ट्रीय हित होता है। बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत ने यह दिखाया है कि वह सिद्धांतों और यथार्थ के बीच संतुलन साध सकता है।
भारत-इस्राइल संबंधों की यह यात्रा हमें यही सिखाती है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होते, केवल स्थायी हित होते हैं। और भारत ने अपने हितों की रक्षा करते हुए एक नई कूटनीतिक परिपक्वता का परिचय दिया है।


