शरद कटियार
नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित इंडिया ए आई इम्पैक्ट समिट 2026 का उद्देश्य भारत की कृत्रिम बुद्धिमत्ता क्षमता को वैश्विक मंच पर स्थापित करना था। लेकिन इस प्रतिष्ठित आयोजन में सामने आए एक विवाद ने न केवल एक विश्वविद्यालय बल्कि पूरे तंत्र की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया।
गलगोटिस यूनिवर्सिटी द्वारा प्रदर्शित रोबोटिक डॉग को ‘स्वदेशी नवाचार’ बताने का दावा कुछ ही घंटों में विवाद में बदल गया। सोशल मीडिया और तकनीकी विशेषज्ञों ने संकेत दिया कि यह दरअसल चीन निर्मित व्यावसायिक मॉडल यूनित्री Go2 है। सवाल यह नहीं है कि रोबोट विदेशी था; असली प्रश्न यह है कि उसे किस आधार पर स्वदेशी शोध के रूप में प्रस्तुत किया गया?
केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इस पर स्पष्ट नाराजगी जताई। उनका कहना था कि AI जैसे संवेदनशील और रणनीतिक क्षेत्र में पारदर्शिता से समझौता नहीं किया जा सकता। अंतरराष्ट्रीय मंच पर यदि कोई संस्था भ्रामक प्रस्तुति देती है, तो उसका प्रभाव केवल उस संस्था तक सीमित नहीं रहता — वह देश की छवि को प्रभावित करता है।
सरकार की यह प्रतिक्रिया आवश्यक थी, क्योंकि ‘मेक इन इंडिया’ और ‘डिजिटल इंडिया’ जैसे अभियानों के बीच किसी भी प्रकार की अतिशयोक्ति या गलत प्रस्तुति विश्वसनीयता को कमजोर करती है।
विश्वविद्यालय ने खेद व्यक्त किया और कहा कि प्रस्तुति के दौरान तकनीकी जानकारी स्पष्ट रूप से साझा नहीं हो सकी। परंतु यह तर्क कई सवाल छोड़ जाता है।
क्या यह मात्र संप्रेषण की त्रुटि थी?
क्या शोध और नवाचार के नाम पर बाज़ार में उपलब्ध उत्पाद को प्रदर्शित करना अकादमिक नैतिकता के अनुरूप है?
माफी एक प्रारंभिक कदम हो सकती है, लेकिन उससे विश्वास स्वतः बहाल नहीं होता।
कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने इस घटना को सरकार की ‘दिखावे की राजनीति’ से जोड़ते हुए कहा कि यदि देश को तकनीकी महाशक्ति बनाना है तो वास्तविक निवेश, पारदर्शी शोध और संस्थागत ईमानदारी जरूरी है, न कि मंचीय प्रदर्शन।
उत्तर प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पाण्डेय ने भी मुद्दा उठाते हुए कहा कि “विदेशी कुत्ता लाकर उसे स्वदेशी बताना देश को दुनिया में हास्यास्पद स्थिति में डालता है।” विपक्ष ने इसे शिक्षा व्यवस्था की निगरानी और जवाबदेही से जोड़ा।
यह घटना केवल एक विश्वविद्यालय की भूल नहीं मानी जानी चाहिए। यह उस मानसिकता की ओर संकेत करती है जिसमें प्रस्तुति, प्रचार और ‘इवेंट मैनेजमेंट’ को वास्तविक शोध से अधिक महत्व मिल जाता है।
भारत में स्टार्टअप और ए आई पारिस्थितिकी तेजी से विकसित हो रही है। ऐसे समय में यदि किसी भी स्तर पर तथ्यात्मक शिथिलता दिखाई देती है तो उसका असर वैश्विक निवेश और साझेदारी पर पड़ सकता है।
जरूरत है स्पष्ट दिशा-निर्देशों की—
अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में प्रदर्शित तकनीकों का सत्यापन,शैक्षणिक संस्थानों में शोध नैतिकता की सख्ती,जवाबदेही तय करने की पारदर्शी प्रक्रिया की,ए आई का भविष्य भरोसे पर टिका है। यदि भरोसा डगमगाएगा, तो तकनीकी प्रगति की चमक फीकी पड़ जाएगी।
निष्कर्षतः, एक ‘रोबोटिक डॉग’ से शुरू हुआ यह विवाद हमें याद दिलाता है कि वैश्विक मंच पर सम्मान पाने के लिए केवल तकनीक नहीं, बल्कि सत्यनिष्ठा भी उतनी ही अनिवार्य है। भारत को तकनीकी नेतृत्व की राह पर आगे बढ़ना है तो दिखावे से अधिक वास्तविक नवाचार पर बल देना होगा।
एक रोबोट, कई सवाल — ए आई समिट विवाद ने खोल दी जवाबदेही की परतें


