शरद कटियार
दिल्ली-एनसीआर के कई स्कूलों को भेजे गए धमकी भरे ईमेल ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि आतंक की मानसिकता अब नए रूपों में सामने आ रही है। कभी बम और बंदूक के सहारे, तो कभी डिजिटल माध्यम से—लेकिन उद्देश्य एक ही होता है भय फैलाना, समाज को अस्थिर करना और राष्ट्र की आत्मा को चोट पहुंचाना।
जब किसी भी रूप में स्कूलों और मासूम बच्चों को निशाना बनाया जाता है, तो यह केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं रह जाता। यह राष्ट्र के भविष्य पर सीधा हमला होता है। बच्चे किसी राजनीतिक विचारधारा का हिस्सा नहीं होते, वे किसी एजेंडे के मोहरे नहीं होते। वे इस देश की आशा हैं, ऊर्जा हैं और आने वाले कल की बुनियाद हैं।
धमकी भरे ईमेल में चाहे जो भाषा इस्तेमाल की गई हो, चाहे जिस नाम से संदेश भेजा गया हो—यह स्पष्ट है कि इसका मकसद दहशत पैदा करना था। अभिभावकों के मन में डर बैठाना, बच्चों की पढ़ाई और मानसिक शांति को प्रभावित करना, और समाज में असुरक्षा का वातावरण बनाना—यही आतंक की रणनीति होती है।
लेकिन आतंक फैलाने वालों को यह समझ लेना चाहिए कि भारत अब वह देश नहीं है जो डरकर चुप बैठ जाए। यह नया भारत है—तकनीकी रूप से सक्षम, कानूनी रूप से सशक्त और मानसिक रूप से दृढ़।
बच्चों को निशाना बनाना सबसे घृणित अपराध है।
आतंकवाद की सबसे कायराना पहचान यही है कि वह निर्दोषों को लक्ष्य बनाता है। स्कूल, अस्पताल और धार्मिक स्थल,ये ऐसे स्थान हैं जहां केवल विश्वास और उम्मीद बसती है। इन पर हमला करना या धमकी देना यह दर्शाता है कि ऐसे तत्वों के पास कोई नैतिक आधार नहीं है।
बच्चों को डराने की कोशिश करना केवल एक आपराधिक हरकत नहीं, बल्कि समाज की जड़ों को कमजोर करने की कोशिश है। यदि बच्चे भय में जीने लगें, तो राष्ट्र की आत्मा कमजोर पड़ जाती है।
आज अपराध का स्वरूप बदल चुका है। एक ईमेल, एक फर्जी आईडी या एक डिजिटल संदेश के माध्यम से भी बड़ा भय पैदा किया जा सकता है। साइबर स्पेस अब केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि अपराधियों के लिए नया हथियार भी बन गया है।
इसलिए आवश्यक है कि साइबर सुरक्षा तंत्र को और मजबूत किया जाए।स्कूलों में डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम लागू हों।ईमेल सर्वर और नेटवर्क की नियमित जांच हो।संदिग्ध गतिविधियों पर त्वरित कार्रवाई की जाए।साइबर अपराध को “मजाक” या “शरारत” कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा विषय है।
अब समय आ गया है कि ऐसे मामलों में शून्य सहिष्णुता की नीति अपनाई जाए। दोषियों की पहचान कर उन्हें कड़ी से कड़ी सजा दी जाए, ताकि भविष्य में कोई भी ऐसी हरकत करने से पहले सौ बार सोचे।
खुफिया एजेंसियों, साइबर सेल और स्थानीय पुलिस के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है। यदि किसी विदेशी सर्वर या अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की भूमिका सामने आती है, तो वैश्विक स्तर पर सहयोग लेकर कार्रवाई की जानी चाहिए।
आतंक का उद्देश्य केवल डर फैलाना नहीं, बल्कि समाज को बांटना भी होता है। अफवाहें, भ्रामक संदेश और भावनात्मक उकसावे अक्सर आतंक के एजेंडे को मजबूत करते हैं।
इसलिए समाज को चाहिए कि: अफवाहों पर विश्वास न करे। आधिकारिक सूचना का ही पालन करे। बच्चों में भय न फैलने दे। प्रशासन का सहयोग करे। एकजुट समाज ही आतंक के खिलाफ सबसे बड़ी ताकत है।
हम स्पष्ट शब्दों में कहना चाहते हैं, हमारे बच्चे हमारा अभिमान हैं। उनकी मुस्कान में भारत का भविष्य बसता है। उनकी शिक्षा में राष्ट्र की प्रगति छिपी है।
जो भी ताकतें बच्चों की सुरक्षा से खिलवाड़ करने की कोशिश करेंगी, उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि भारत अपने भविष्य की रक्षा के लिए हर वैधानिक और संवैधानिक कदम उठाने में सक्षम है।
भारत शांति में विश्वास करता है, लेकिन अपनी सुरक्षा और सम्मान के साथ कोई समझौता नहीं करता।
आतंक की भाषा चाहे धमकी की हो, लेकिन भारत की भाषा साहस, एकता और न्याय की है।
हम डरेंगे नहीं।हम बंटेंगे नहीं।हम झुकेंगे नहीं।बच्चों की सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं, उनकी ओर नजर भी उठाई तो आंखें ही निकाल लेंगे।यह राष्ट्र का अटूट वचन है।
धूर्त अतंकियों बच्चों की ओर उठी हर बुरी नजर का जवाब पूरा भारत देगा


