नई दिल्ली में पूर्व थलसेना प्रमुख की किताब को लेकर उठा विवाद अब केवल एक प्रकाशन या कानूनी प्रक्रिया का प्रश्न नहीं रह गया है, बल्कि यह सीधे तौर पर लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सत्ता की असहजता से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन चुका है। लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी द्वारा सरकार पर किया गया ताज़ा हमला इसी चिंता को रेखांकित करता है।
राहुल गांधी का स्पष्ट कहना है कि पूर्व सेना प्रमुख मनोज मुकुंद नरवणे झूठ नहीं बोल रहे हैं। यदि ऐसा है, तो सवाल यह उठता है कि सरकार और उससे जुड़े तंत्र को एक किताब से इतना भय क्यों है? क्या सच का सामने आना सत्ता के लिए असहज हो गया है?
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सवाल
लोकतांत्रिक व्यवस्था में किताबें, लेख और विचार संवाद का माध्यम होते हैं, न कि अपराध। लेकिन जिस तरह से नरवणे की किताब को लेकर एफआईआर, दबाव और विरोधाभासी बयान सामने आए हैं, वे यह संकेत देते हैं कि सरकार असहमति और असुविधाजनक तथ्यों से बचना चाहती है। राहुल गांधी का यह कहना कि यह पूरा मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है, यूं ही नहीं कहा जा सकता।
प्रकाशक पेंगोइन रैंडम हाउस इंडिया का एफआईआर के बाद यह कहना कि किताब न छपी है और न ही बिकी, कई सवाल खड़े करता है। यदि ऐसा है, तो फिर यह किताब सार्वजनिक दायरे में कैसे पहुंची? और यदि किताब का कोई अंश लीक हुआ है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म और जवाबदेही
राहुल गांधी द्वारा यह दावा कि किताब ऑनलाइन प्लेटफॉर्म Amazon पर उपलब्ध है, इस पूरे प्रकरण को और गंभीर बना देता है। यदि किताब वास्तव में वहां बिक रही है, तो यह प्रकाशक के दावों का सीधा खंडन है। ऐसे में सवाल केवल सरकार से ही नहीं, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही पर भी उठता है।
यदि किताब आधिकारिक रूप से प्रकाशित नहीं हुई है, तो उसका अवैध प्रसार रोकना प्रशासन की जिम्मेदारी है। लेकिन इस आड़ में विचारों को कुचलना, लेखकों और पूर्व अधिकारियों को डराना लोकतंत्र की आत्मा पर प्रहार है। राहुल गांधी की यह मांग कि किताब लीक होने के मामले में दिल्ली में मुकदमा दर्ज हो, एक कानूनी प्रक्रिया है, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी है निष्पक्ष जांच।
इस पूरे विवाद का सबसे अहम प्रश्न यही है—यदि किताब में लिखा सच नहीं है, तो सरकार को डर किस बात का है? और यदि उसमें सच है, तो उसे दबाने की कोशिश क्यों? लोकतंत्र में सच्चाई को अदालतों और जांच एजेंसियों से नहीं, बल्कि संवाद और पारदर्शिता से परखा जाता है।
नरवणे की किताब को लेकर उठा विवाद एक चेतावनी है। यह बताता है कि आज भी सत्ता और सच के बीच टकराव बना हुआ है। ऐसे समय में जरूरी है कि सरकार, प्रकाशक और डिजिटल प्लेटफॉर्म तीनों अपनी-अपनी जिम्मेदारी निभाएं। क्योंकि किताबें रोकी जा सकती हैं, लेकिन सवालों को हमेशा के लिए दबाया नहीं जा सकता।






