गाजियाबाद में नकली लिवर दवा Liv-52 बनाने वाले गिरोह का भंडाफोड़ एक बार फिर यह साबित करता है कि हमारे देश में जनस्वास्थ्य से बड़ा कोई मुद्दा नहीं, लेकिन सबसे ज़्यादा उपेक्षित भी यही है। पांच लोगों की गिरफ्तारी से ज्यादा अहम सवाल यह है कि यह ज़हर महीनों तक बाजार में कैसे बिकता रहा और व्यवस्था को इसकी भनक तक क्यों नहीं लगी।
नकली दवाओं का यह धंधा सिर्फ कानून तोड़ने का मामला नहीं है, यह सीधे-सीधे लोगों की जिंदगी से खेलने का अपराध है। जो मरीज लिवर जैसी गंभीर बीमारी में दवा खा रहा था, उसे यह भरोसा था कि वह इलाज करवा रहा है। लेकिन हकीकत में वह धीरे-धीरे मौत की ओर धकेला जा रहा था। क्या इस मौत की जिम्मेदारी सिर्फ पांच गिरफ्तार आरोपियों की है? या फिर उस पूरे सिस्टम की, जो आंख मूंदकर बैठा रहा?
चार महीनों तक यह गिरोह अलीगढ़, मथुरा, मेरठ, बिजनौर जैसे जिलों में नकली दवा सप्लाई करता रहा। सवाल यह है कि इतने बड़े पैमाने पर सप्लाई बिना किसी स्थानीय मिलीभगत के कैसे संभव है? औषधि विभाग, ड्रग इंस्पेक्टर, स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन—सबकी भूमिका पर सवाल खड़े होते हैं। अगर नियमित जांच होती, अगर मेडिकल स्टोरों पर सही तरीके से निगरानी होती, तो यह धंधा इतना आगे बढ़ ही नहीं पाता।
यह भी सच्चाई है कि नकली दवा असली से 20 प्रतिशत सस्ती थी। यानी मुनाफे के लालच में दुकानदार भी आंख बंद कर दवा खरीद रहे थे। यहां सिर्फ अपराधी ही नहीं, लालच और लापरवाही भी बराबर के दोषी हैं। जब तक मेडिकल स्टोर मालिकों की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक यह खेल चलता रहेगा।
सरकारें अक्सर कहती हैं कि स्वास्थ्य प्राथमिकता है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि स्वास्थ्य व्यवस्था में निगरानी नाम की चीज़ सिर्फ फाइलों में जिंदा है। हर बड़े खुलासे के बाद कुछ गिरफ्तारियां होती हैं, कुछ बयान आते हैं और मामला धीरे-धीरे ठंडा पड़ जाता है। न तो सिस्टम सुधरता है और न ही जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होती है।
सबसे खतरनाक बात यह है कि नकली दवाओं का असर तुरंत दिखाई नहीं देता। मरीज सोचता है कि दवा असर नहीं कर रही, बीमारी बढ़ रही है, और तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। यह अपराध इसलिए और भी खतरनाक है क्योंकि इसमें मौत शांत तरीके से आती है, बिना शोर के।
अब जरूरत सिर्फ़ यह नहीं है कि इस गिरोह को सज़ा मिले। जरूरत यह है कि दवा निरीक्षण व्यवस्था को मजबूत किया जाए,जांच में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों को कटघरे में खड़ा किया जाए,और मेडिकल स्टोरों पर सख्त निगरानी लागू की जाए।
अगर आज भी यह मामला सिर्फ एक “पुलिस की सफलता” बनकर रह गया, तो कल किसी और बीमारी की नकली दवा बाजार में होगी। तब सवाल फिर वही रहेगा जब दवा ही भरोसे के लायक नहीं रही, तो आम आदमी आखिर जिए कैसे?
अगर अब भी व्यवस्था नहीं जागी, तो नकली दवाओं का यह ज़हर किसी एक अंग को नहीं, पूरे समाज को बीमार कर देगा।






