
शरद कटियार
जेफरी एपस्टीन—यह नाम अब किसी एक देश या अदालत तक सीमित नहीं रहा। यह वैश्विक राजनीति में सत्ता के दुरुपयोग, न्यायिक समझौतों, और प्रभावशाली नेटवर्क की उस संरचना का प्रतीक बन चुका है, जिसने दुनिया की सबसे मज़बूत कही जाने वाली लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है। उसकी मौत को सात साल बीत चुके हैं, लेकिन अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और अन्य यूरोपीय देशों में उससे जुड़े दस्तावेज़ और रिपोर्ट्स आज भी राजनीतिक हलचल पैदा कर रहे हैं।
अमेरिका में एपस्टीन का मामला 2005 में फ्लोरिडा से शुरू हुआ। दर्जनों नाबालिग पीड़िताओं के बयानों के बावजूद 2008 में उसे एक असाधारण प्ली-डील दी गई, जिसके तहत वह गंभीर यौन अपराधों से बच निकला। अमेरिकी मीडिया खासतौर पर मिमी हेराल्ड की खोजी रिपोर्ट्स ने बाद में खुलासा किया कि इस डील ने पीड़ितों के अधिकारों को दरकिनार किया।
2019 में न्यूयॉर्क में फेडरल ट्रैफिकिंग चार्ज लगने के बाद मामला फिर से जीवित हुआ, लेकिन जेल में उसकी मौत ने सच्चाई तक पहुँचने की प्रक्रिया को अधूरा छोड़ दिया। अमेरिकी न्याय विभाग ने लापरवाही स्वीकार की, पर कई सवाल आज भी अनुत्तरित हैं।
एपस्टीन के संपर्कों को लेकर यूरोपीय मीडिया द गार्डियन, बीबीसी, देर स्पीएगेल ने लगातार रिपोर्टिंग की। ब्रिटेन में यह सवाल उठा कि क्या वैश्विक अभिजात वर्ग के कुछ हिस्से जांच के दायरे से बाहर रहे। फ्रांस और जर्मनी में मानवाधिकार संगठनों ने मांग की कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यौन तस्करी मामलों में सीमापार जांच तंत्र मजबूत किया जाए।
नेटवर्क का अंतरराष्ट्रीय स्वरूप
जांच दस्तावेज़ बताते हैं कि एपस्टीन का नेटवर्क केवल अमेरिका तक सीमित नहीं था। उसकी निजी जेट उड़ानें, कैरेबियन द्वीप पर ठिकाने और अंतरराष्ट्रीय यात्राएं इस ओर इशारा करती हैं कि यह मामला ग्लोबल एलीट नेटवर्क से जुड़ा था। हालांकि, संपर्क होना और अपराध में शामिल होना—इन दोनों के बीच फर्क करना ज़रूरी है, जिसे मीडिया और जांच एजेंसियों ने कई बार रेखांकित किया है।
इसी अंतरराष्ट्रीय शोर के बीच सोशल मीडिया पर कुछ मंचों ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम भी एपस्टीन प्रकरण से जोड़ने की कोशिश की।
अंतरराष्ट्रीय फैक्ट-चेक संस्थाओं और मुख्यधारा के मीडिया रिकॉर्ड्स के अनुसार पीएम मोदी का नाम किसी भी अमेरिकी या यूरोपीय अदालत के दस्तावेज़ में नहीं है।
न एपस्टीन की फ्लाइट लॉग्स, न चार्जशीट्स और न ही पीड़ितों के बयानों में उनका उल्लेख मिलता है।
किसी भी अंतरराष्ट्रीय जांच एजेंसी ने पीएम मोदी को लेकर कोई नोटिस या जांच जारी नहीं की।
यह स्थिति साफ़ बताती है कि यह जोड़ अफ़वाह और दुष्प्रचार का परिणाम है, न कि तथ्य का।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एपस्टीन केस ने यह भी दिखाया कि खोजी पत्रकारिता और सोशल मीडिया अफ़वाहों के बीच संघर्ष कितना तीखा हो गया है। जहां मिमी हेराल्ड जैसी रिपोर्ट्स ने वर्षों की मेहनत से सच्चाई निकाली, वहीं कुछ डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने बिना प्रमाण नाम जोड़कर भ्रम फैलाया।
एपस्टीन प्रकरण से दुनिया को तीन अहम सबक मिलते हैं ताक़तवर लोगों के मामलों में स्वतंत्र और पारदर्शी जांच अनिवार्य है।
यौन तस्करी जैसे अपराधों से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग ज़रूरी है।
बिना प्रमाण के आरोप लोकतांत्रिक विमर्श को नुकसान पहुंचाते हैं।
जेफरी एपस्टीन का मामला वैश्विक लोकतंत्रों के लिए चेतावनी है कि सत्ता, धन और अपराध का गठजोड़ कितनी आसानी से व्यवस्था की कमजोरियों का फायदा उठा सकता है। लेकिन उतनी ही बड़ी चुनौती है सच को अफ़वाह से अलग करना।जब तक पत्रकारिता तथ्यपरक, खोजी और जिम्मेदार रहेगी, तब तक लोकतंत्र अफ़वाहों के शोर में भी अपनी आवाज़ बचाए रखेगा।


