शरद कटियार
उत्तर प्रदेश में अवैध खनन अब केवल कानून उल्लंघन या प्रशासनिक चूक का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह एक ऐसी समानांतर व्यवस्था बन चुका है, जो नियमों, पर्यावरण और आम आदमी की जान—तीनों पर भारी पड़ रही है। प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से लगातार सामने आ रही घटनाएं इस बात की गवाही दे रही हैं कि खनन माफिया का दुस्साहस किस स्तर तक पहुंच चुका है। दिन के उजाले में कागजों पर नियम और रात के अंधेरे में पोकलैंड, डंपर और ट्रैक्टर—यही आज यूपी के खनन की असली तस्वीर बन चुकी है।
नदियों के किनारे, गांवों की पगडंडियों पर, कस्बों की सड़कों पर और शहरों के बाहरी इलाकों में रात होते ही भारी वाहनों की आवाजें गूंजने लगती हैं। ये आवाजें सिर्फ मशीनों की नहीं होतीं, बल्कि उस सिस्टम की भी होती हैं, जिसने या तो आंखें बंद कर ली हैं या फिर जानबूझकर देखने से इनकार कर रहा है। अवैध मौरंग, बालू और मिट्टी का खनन प्रदेश के बुंदेलखंड, अवध, तराई, दोआब और पश्चिमी यूपी—हर क्षेत्र में फैला हुआ है। कहीं नदी का सीना चीरकर खनन हो रहा है, तो कहीं खेतों और ग्राम समाज की जमीन को रातों-रात खोखला किया जा रहा है।
पर्यावरण संरक्षण के लिए बनाए गए कानून और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के स्पष्ट निर्देश मौजूद हैं। रात में खनन पर रोक है, नदी तल में भारी मशीनों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध है, पर्यावरणीय स्वीकृति और सीमित मात्रा में ही खनन की अनुमति दी जा सकती है। इसके बावजूद जमीनी हकीकत यह है कि इन नियमों का पालन कागजों तक सिमट कर रह गया है। जिन नदियों को जीवनदायिनी कहा जाता है, वे आज माफिया के लिए खनिज भंडार बन चुकी हैं।
सरकारी आंकड़े और स्वतंत्र रिपोर्टें बताती हैं कि अवैध खनन से हर साल राज्य को सैकड़ों करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान होता है। इसके बावजूद कार्रवाई के नाम पर अक्सर खानापूरी दिखाई देती है। कहीं-कहीं ट्रैक्टर या डंपर पकड़ लिए जाते हैं, कुछ जुर्माना लग जाता है, लेकिन बड़े नेटवर्क और उनके संरक्षकों तक कानून की पहुंच नहीं हो पाती। यही वजह है कि माफिया को डर नहीं लगता और अवैध खनन लगातार बढ़ता जा रहा है।
इस पूरे खेल का सबसे भयावह पहलू तब सामने आता है, जब अवैध खनन सीधे आम नागरिकों की जान लेने लगता है। ओवरलोड डंपर रात के समय रफ्तार के साथ गांवों और कस्बों से गुजरते हैं। न कोई निगरानी, न कोई रोक-टोक। सड़कें टूट चुकी हैं, अंधेरा रहता है और ऐसे में ये डंपर चलते-फिरते मौत बन जाते हैं। हाल ही में फर्रुखाबाद में ऐसा ही एक मामला सामने आया, जिसने पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। रात में अवैध खनन में लगे एक डंपर ने एक युवक को कुचल दिया, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। यह हादसा नहीं, बल्कि अवैध खनन की सीधी परिणति थी।
फर्रुखाबाद की इस घटना को लेकर स्थानीय स्तर पर यह चर्चा आम है कि संबंधित डंपर को सरकार के एक प्रभावशाली सफेदपोश का संरक्षण प्राप्त था। कहा जा रहा है कि यही कारण था कि डंपर बेखौफ होकर रात में सड़कों पर दौड़ रहा था। घटना के बाद कुछ औपचारिक कार्रवाई जरूर हुई, लेकिन सवाल यह है कि क्या उस संरक्षण तक जांच पहुंचेगी? क्या उस सफेदपोश से जवाबदेही तय होगी, या फिर मामला समय के साथ ठंडे बस्ते में चला जाएगा?
यह पहली बार नहीं है जब फर्रुखाबाद या प्रदेश के किसी अन्य जिले में अवैध खनन से जुड़ी गतिविधियों ने किसी की जान ली हो। पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें ओवरलोड खनन वाहनों से कुचलकर लोग मारे गए। इन घटनाओं के बाद हर बार प्रशासन सख्ती की बात करता है, लेकिन जमीनी हालात ज्यादा नहीं बदलते। माफिया कुछ दिन शांत रहता है और फिर पहले से ज्यादा संगठित होकर लौट आता है।
अवैध खनन के पीछे केवल लालच नहीं, बल्कि एक पूरा तंत्र काम करता है। इस तंत्र में स्थानीय स्तर के कुछ कर्मचारी, कुछ अधिकारी, कुछ नेता और कुछ कारोबारी शामिल होते हैं। शिकायत करने वाले ग्रामीणों को डराया जाता है, कभी-कभी उनके खिलाफ ही मुकदमे दर्ज कर दिए जाते हैं। जो आवाज उठाता है, उसे चुप कराने की कोशिश होती है। यही वजह है कि कई जगह लोग सब कुछ जानते हुए भी बोलने से डरते हैं।
पर्यावरणीय नुकसान की बात करें, तो उसका आकलन शायद आंकड़ों में भी पूरी तरह नहीं हो सकता। अवैध खनन से नदियों का प्राकृतिक प्रवाह बाधित हो रहा है, नदी किनारे बसे गांवों में कटाव बढ़ रहा है, भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है। खेती प्रभावित हो रही है, पशुपालन और मत्स्य पालन पर असर पड़ रहा है। आने वाली पीढ़ियों के लिए पानी का संकट और गहरा होता जा रहा है। यह सिर्फ आज का नुकसान नहीं, बल्कि भविष्य के साथ किया जा रहा खिलवाड़ है।
प्रशासन की भूमिका को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह सब उसकी जानकारी के बिना हो सकता है? क्या रात-रात भर चलने वाले डंपर, नदी में गरजती पोकलैंड मशीनें और खुलेआम हो रहा खनन प्रशासन की नजर से छिपा रह सकता है? जवाब साफ है—नहीं। या तो निगरानी तंत्र पूरी तरह विफल है, या फिर जानबूझकर आंखें मूंदी जा रही हैं। दोनों ही स्थितियां शासन के लिए शर्मनाक हैं।
जब कार्रवाई होती भी है, तो अक्सर वह निचले स्तर तक सीमित रहती है। ड्राइवर पकड़ लिया गया, ट्रैक्टर सीज हो गया, लेकिन असली मालिक और नेटवर्क सुरक्षित रहते हैं। यही वजह है कि अवैध खनन एक बार बंद होकर दोबारा और तेजी से शुरू हो जाता है। इसलिए लगते हैं, क्योंकि आम आदमी देखता है कि नियम सबके लिए बराबर नहीं हैं।
प्रदेश में विकास की बातें की जाती हैं, लेकिन यह विकास किस कीमत पर? नदियों को खोदकर, सड़कों को तोड़कर, लोगों की जान लेकर? अगर यही विकास है, तो यह किसी भी सभ्य समाज के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकता। कानून का राज तभी माना जाएगा, जब नियमों का पालन ताकतवर और कमजोर दोनों पर समान रूप से हो।
अब जरूरत आधे-अधूरे अभियानों की नहीं, बल्कि ठोस और पारदर्शी कार्रवाई की है। अवैध खनन पर जीरो टॉलरेंस की नीति सिर्फ बयान में नहीं, जमीन पर दिखनी चाहिए। खनन से जुड़े मामलों में जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय हो, संरक्षण देने वाले चेहरों तक जांच पहुंचे और दोषियों पर ऐसी कार्रवाई हो, जो दूसरों के लिए सबक बने।
उत्तर प्रदेश के जनपद फर्रुखाबाद सहित अन्य जनपदों की घटनाएं चेतावनी हैं कि अगर सिस्टम ने अब भी आंखें नहीं खोलीं, तो अगली मौत किसी और जिले में होगी, किसी और परिवार की खुशियां उजड़ेंगी। सवाल यह नहीं कि अवैध खनन हो रहा है या नहीं, सवाल यह है कि उसे रोका क्यों नहीं जा रहा। आखिर चलेगा क्या—कानून का राज या खनन माफिया की पावर? यह फैसला अब शासन और प्रशासन को करना है, क्योंकि जनता का धैर्य और प्रकृति—दोनों ही तेजी से जवाब दे रहे हैं।

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