
उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से आई यह घटना केवल एक दुखद समाचार नहीं है, बल्कि हमारे समय की सबसे गंभीर सामाजिक चेतावनी भी है। साहिबाबाद क्षेत्र में तीन नाबालिग सगी बहनों द्वारा एक साथ जीवन समाप्त कर लेना, किसी एक परिवार की त्रासदी भर नहीं, बल्कि उस सामाजिक चूक का परिणाम है, जिसे हम लंबे समय से अनदेखा करते आ रहे हैं।
प्रश्न यह नहीं है कि कौन-सा डिजिटल खेल इसका कारण बना, बल्कि असली प्रश्न यह है कि क्या हमने बच्चों की दुनिया को केवल मोबाइल स्क्रीन के भरोसे छोड़ दिया है?
क्या माता-पिता, समाज और व्यवस्था—तीनों ने मिलकर अपनी जिम्मेदारी निभाई?
आज मोबाइल और ऑनलाइन खेल बच्चों के लिए केवल मनोरंजन का साधन नहीं रह गए हैं, बल्कि कई मामलों में वे उनकी पूरी मानसिक दुनिया को नियंत्रित करने लगे हैं। जब खेल प्रतिस्पर्धा, हिंसा, भय या काल्पनिक मिशनों में बदल जाते हैं, तब नाबालिग मन उन्हें वास्तविक जीवन से जोड़ बैठता है। यही वह बिंदु है, जहां खेल लत बन जाता है और लत धीरे-धीरे मानसिक संकट का रूप ले लेती है।
इस घटना में पुलिस द्वारा डिजिटल खेल की लत को एक संभावित कारण मानना गंभीर संकेत है। इसका अर्थ यह नहीं कि दोष केवल किसी खेल का है, बल्कि यह दर्शाता है कि बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर निगरानी की प्रणाली ही कमजोर है।
आधुनिक जीवन की व्यस्तता में अभिभावक अक्सर बच्चों को ‘व्यस्त’ रखने के लिए मोबाइल सौंप देते हैं। पढ़ाई के साथ-साथ घंटों स्क्रीन में डूबे रहना अब सामान्य मान लिया गया है। लेकिन क्या हमने कभी यह जानने की कोशिश की कि बच्चा क्या देख रहा है, क्या खेल रहा है और उस पर उसका मानसिक प्रभाव क्या पड़ रहा है?
तीन नाबालिग बहनों का एक साथ यह कदम उठाना बताता है कि यह कोई क्षणिक आवेग नहीं, बल्कि अंदर ही अंदर पनप रहा गहरा मानसिक दबाव हो सकता है—जिसे समय रहते पहचाना नहीं गया।
समाज और व्यवस्था की जिम्मेदारी
यह घटना केवल एक पुलिस जांच का विषय बनकर नहीं रह जानी चाहिए। स्कूलों, शिक्षकों, समाजसेवियों और प्रशासन—सभी को आत्ममंथन करना होगा।
क्या स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य पर संवाद हो रहा है?क्या अभिभावकों को डिजिटल जागरूकता के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है?क्या बच्चों के लिए परामर्श व्यवस्था सुलभ है?
यदि इन सवालों के उत्तर ‘नहीं’ हैं, तो ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति का खतरा बना रहेगा।
इस त्रासदी से सबक लेते हुए समाज को यह स्वीकार करना होगा कि डिजिटल माध्यमों पर पूर्ण प्रतिबंध समाधान नहीं है, बल्कि संतुलित उपयोग, सतत संवाद और भावनात्मक जुड़ाव ही बच्चों को सुरक्षित रख सकता है।
माता-पिता को समय देना होगा, सुनना होगा, और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ सहायता लेने से संकोच नहीं करना होगा।
तीन मासूम जिंदगियों का यूं एक साथ बुझ जाना, केवल एक खबर नहीं—यह हमारे दौर का आईना है।
यदि अब भी हमने बच्चों की मानसिक दुनिया को समझने की कोशिश नहीं की, तो सवाल केवल “कौन-सा खेल जिम्मेदार था” तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि “हम सब कहां चूक गए”—यह प्रश्न और भी भयावह रूप ले लेगा।






