पुलिस और नेता बनाते हैं माफिया — सत्ता के संरक्षण में पलता अपराध का साम्राज्य

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✍️ शरद कटियार

देश में माफिया कोई पैदा नहीं होता, उसे प्रणाली पैदा करती है — पुलिस की ढाल और नेताओं की चाल से। यह वह सड़ी हुई सच्चाई है जिसे सत्ता के गलियारों में सब जानते हैं, पर कोई बोलता नहीं। आम जनता के सिर पर कानून का डंडा चलता है, मगर अपराधी उसी कानून की किताब के पन्नों में छिपा बैठा होता है, क्योंकि उसके सिर पर राजनीति का हाथ और पुलिस की सुरक्षा होती है।
यह कोई विडंबना नहीं, बल्कि लोकतंत्र के गले में पड़ा लोहे का ताला है, जहां कानून की रखवाली करने वाले ही कानून को बेचते हैं। नेता चुनाव जीतने के लिए अपराधियों को हथियार बनाते हैं, और पुलिस अफसर मलाईदार पोस्टिंग के लिए उन्हीं अपराधियों की चौखट पर हाजिरी देते हैं। यही से शुरू होता है अपराध का गठजोड़, जो बाद में माफिया राज का चेहरा बन जाता है।
जब अपराधी नेताओं के लिए वोट जुटाते हैं, वही नेता उन्हें सरकारी संरक्षण देते हैं। जब पुलिस अपराधी के खिलाफ कार्रवाई करने की जगह फोन आने का इंतजार करती है, तब समझ लीजिए कि न्याय तंत्र का गला घोंट दिया गया है। यह वही दौर है जब थाने और सचिवालय अपराध की फैक्ट्रियां बन जाते हैं।
उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड या महाराष्ट्र — हर राज्य में अपराध की कहानी एक जैसी है। माफिया ठेके तय करता है, ट्रांसफर-पोस्टिंग करवाता है, शराब और खनन के कारोबार पर राज करता है, और पुलिस अधिकारी उसे ‘सर’ कहकर संबोधित करते हैं। जनता टैक्स देकर उस व्यवस्था को पालती है जो अपराधियों को बचाने में लगी होती है।
यही वह घिनौनी सच्चाई है जो हर ईमानदार इंसान के गले में हड्डी की तरह अटकी हुई है। माफिया कभी जेलों में खत्म नहीं होते, क्योंकि जेल की चाबी भी उन्हीं के हाथ में होती है। जब शासन और प्रशासन अपराध से रिश्ता तोड़ने की बजाय उसके साथ साझेदारी कर लेता है, तब समाज में भय और भ्रष्टाचार दोनों स्थायी हो जाते हैं।
नेता अपराधियों को मंच देते हैं, पुलिस उन्हें सुरक्षा देती है, और दोनों मिलकर जनता के अधिकारों की कब्र खोदते हैं। जब कोई माफिया मारा जाता है, तो यह जीत नहीं होती; असली जीत तब होगी जब उसे पैदा करने वाली व्यवस्था खत्म होगी।
अगर देश सचमुच माफिया मुक्त होना चाहता है, तो पहले सत्ता को अपराध मुक्त करना होगा। क्योंकि सच्चाई यही है —
माफिया अपराध से नहीं, सत्ता के संरक्षण से पलता है।
जब तक पुलिस और नेता का गठजोड़ टूटेगा नहीं, तब तक न्याय सिर्फ भाषणों में रहेगा और अपराधी संसद की सीढ़ियाँ चढ़ता रहेगा।
अब वक्त है कि जनता डरना छोड़ दे और सवाल पूछना शुरू करे —
कानून जनता के लिए है या माफिया के लिए?
क्योंकि जब जनता चुप रहती है, तभी माफिया राजा बनता है… और पुलिस व नेता उसके दरबारी।
उत्तर प्रदेश इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। सपा सरकारों में माफियाओं को न केवल राजनीतिक संरक्षण मिला बल्कि उन्हें सत्ता के केंद्र तक पहुंचाया गया। माफिया को टिकट दिए गए, उन्हें सरकारी ठेकों और ठिकानों पर कब्जा दिलवाया गया। यही कारण था कि प्रदेश में भय और अराजकता का माहौल बन गया था।
लेकिन योगी आदित्यनाथ सरकार ने उस पर निर्णायक प्रहार किया।
योगी सरकार के कार्यकाल में अपराधियों की अवैध संपत्तियों पर बुलडोज़र चला, माफियाओं के नेटवर्क ध्वस्त हुए और प्रशासन को स्पष्ट संदेश दिया गया कि कानून के ऊपर कोई नहीं।
जहां पहले थानों में अपराधियों के फोन से कार्रवाई तय होती थी, वहीं अब पुलिस अपराधियों के ठिकानों पर पहुंचती है। ‘माफिया-मुक्त उत्तर प्रदेश’ अब एक नारा नहीं, बल्कि एक मिशन बन चुका है।
सपा की ढील और संरक्षण से उपजा जो माफिया तंत्र था, उसे योगी सरकार ने पहली बार सत्ता की ढाल के बजाय कानून की तलवार दिखाई। यही वह बदलाव है जिसकी उम्मीद जनता दशकों से कर रही थी।
आज जरूरत है कि जनता भी इस लड़ाई में अपनी आवाज उठाए, क्योंकि लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब सत्ता का संरक्षण जनता को मिलेगा — माफियाओं को नहीं।

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