नई दिल्ली/जिनेवा। भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने मानवाधिकारों के प्रश्न पर ‘राजनीतिक बयानबाजी’ से आगे बढ़ते हुए विकास, क्षमता निर्माण और आतंकवाद के खिलाफ कठोर नीति अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया है। उन्होंने कहा कि मानवाधिकारों का वास्तविक उद्देश्य सबसे कमजोर और वंचित निकायों के जीवन में ठोस, प्रकट देने वाला और स्थायी सुधार लाना चाहिए, न कि इसे केवल वैचारिक बहस या आरोप-प्रत्यारोप का विषय बनाया जाए।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 61वें सत्र में अपने मानवीय मंत्रियों में विदेश मंत्री ने कहा कि वर्तमान वैश्विक परिदृश्य संघर्ष, ध्रुवीकरण और अनिश्चितताओं से घिरा हुआ है। ऐसे समय में भारत साझा आधार तलाशने और उसे खोलने का प्रयास करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत ने हमेशा टकराव के स्थान पर संवाद, विभाजन की जगह सहमति और संकीर्ण हितों की बजाय मानव-संगठन विकास को प्राथमिकता दी है।
विदेश मंत्री ने कहा कि यदि मानवाधिकारों को सार्थक बनाना है तो उन्हें रोजमर्रा के जीवन की वास्तविकताओं से जुड़ना होगा। शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, स्वच्छता, वित्तीय समावेशन और सामाजिक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में ठोस प्रगति ही मानवाधिकारों की सच्ची अभिव्यक्ति है। उन्होंने जोर देकर कहा कि विकास स्वयं मानवाधिकारों की बुनियाद है और इसके बिना अधिकारों की चर्चा अधूरी है।
आतंकवादियों मानवाधिकारों का सबसे जघन्य उल्लंघन
अपने संबोधन में श्री जयशंकर ने आतंकवाद के मुद्दे को विशेष रूप से निर्देशांक किया। उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार परिषद को मानवाधिकारों के प्रति अपनी मांगों को व्यवहार में लाने के लिए आतंकवादी समुदायों के प्रति ‘शून्य सहिष्णुता’ की नीति अपनीनी चाहिए। उनके अनुसार, आतंकवाद मानवाधिकारों का सबसे घोर उल्लंघन है और निर्दोष नागरिकों को प्रभावित करने वाले किसी भी कृत्य का कोई औचित्य नहीं हो सकता।
उन्होंने कहा कि यदि अंतरराष्ट्रीय समुदाय मानवाधिकारों की रक्षा के प्रति गंभीर है, तो उसे आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता और ठोस रुख दिखाना होगा। चयनात्मक दृष्टिकोण या विपरीत माप इस लड़ाई को कमजोर करते हैं।
सातवीं बार परिषद का सदस्य बना भारत
विदेश मंत्री ने यह भी उल्लेख किया कि भारत हाल ही में सातवीं बार मानवाधिकार परिषद का सदस्य चुना गया है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में हुए वोटिंग में भारत को 188 में से 177 देशों का समर्थन मिला। उन्होंने इसे वैश्विक समुदाय, स्वैच्छिक वैश्विक दक्षिण के देशों के विश्वास का प्रतीक बताया।
श्री जयशंकर ने कहा कि भारत मानवाधिकारों को बढ़ावा देने के लिए राजनीतिकरण, चयनात्मक आलोचना और द्विपक्षीय मानकों के बजाय संवाद, साझेदारी और क्षमता निर्माण के मार्ग पर विश्वास करता है। उनके अनुसार, सहयोगी दृष्टिकोण ही स्थायी और समावेशी समाधान दे सकता है।
लोकतांत्रिक मूल्यों और डिजिटल आयामों का उल्लेख
उन्होंने कहा कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में भारत सभी नागरिकों के लिए समानता, गरिमा और न्याय सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। इस संदर्भ में उन्होंने भारत के डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (डीपीआई) मॉडल का उदाहरण देते हुए बताया कि किस प्रकार तकनीक के माध्यम से करोड़ों लोगों तक समावेशी ढंग से कल्याणकारी योजनाएं, वित्तीय सेवाएं और सरकारी सुविधाएं पहुंचाई गई हैं।
विदेश मंत्री ने कहा कि भारत अपने अनुभव और सर्वोत्तम प्रथाओं को वैश्विक हित में साझा करने के लिए तैयार है, ताकि विकास और अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित किया जा सके।
वैश्विक अक्षरों के बीच विकास का महत्व
उन्होंने यह भी निर्देशांक किया कि महामारी, जलवायु परिवर्तन, भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक दबावों ने वैश्विक असमानताओं को और गहरा किया है। ऐसे समय में विकास को मानवाधिकारों के मूल आधार के रूप में स्वीकार करना बेहद जरूरी है।
अपने मंत्रियों के माध्यम से श्री जयशंकर ने स्पष्ट संकेत दिया कि भारत मानवाधिकारों को केवल पुरातनपंथी विमर्श का विषय नहीं, बल्कि भू-परिवर्तन के माध्यम से माना है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से आग्रह किया कि वह मानवाधिकारों की बहस को राजनीतिक ध्रुवीकरण से मुक्त कर वास्तविक सुधार, समावेशी विकास और आतंकवाद के खिलाफ दृढ़ कार्रवाई की दिशा में आगे बढ़ें।


